Wednesday, September 16, 2026
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Teej Mata Jaipur : जयपुर में तीज माता की भव्य शाही सवारी निकली, राजस्थानी लोक कलाकारों ने बांधा समां

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जयपुर में तीज माता की शाही सवारी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यह उत्सव केवल आस्था का नहीं, बल्कि राजस्थान की विरासत, लोककला और राजसी परंपरा का जीवंत उत्सव है। 175 लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों, छोटी चौपड़ की महाआरती, शाही लवाजमे और वैश्विक लाइव प्रसारण ने इस आयोजन को यादगार बना दिया।

सावन की उमंग, परंपरा की गरिमा और जयपुर की सांस्कृतिक पहचान-इन तीनों का दुर्लभ संगम उस समय दिखाई दिया, जब पिंक सिटी की ऐतिहासिक फिजा में तीज माता की शाही सवारी पूरे ठाठ के साथ निकली। त्रिपोलिया गेट से छोटी चौपड़ और गणगौरी बाजार तक बढ़ती इस सवारी ने केवल धार्मिक आस्था को ही नहीं, बल्कि राजस्थान की जीवंत लोकसंस्कृति, राजसी विरासत और सार्वजनिक उत्सवधर्मिता को भी एक साथ सामने ला दिया।

सिटी पैलेस की जनानी ड्योढ़ी में पूजा – अर्चना के बाद जब तीज माता की पालकी शाही लवाजमे के साथ निकली, तो पूरा मार्ग मानो उत्सव में बदल गया। जयपुर के पूर्व राजपरिवार से जुड़े पद्मनाभ सिंह द्वारा त्रिपोलिया गेट पर आरती किए जाने के बाद सवारी नगर भ्रमण के लिए रवाना हुई और शहर की पुरानी गलियां लोकगीतों, वाद्य स्वर और जयकारों से गूंज उठीं। यह दृश्य केवल धार्मिक यात्रा का नहीं, बल्कि जयपुर की उस सांस्कृतिक स्मृति का था, जो पीढ़ियों से शहर की पहचान का हिस्सा रही है।

तीज की शाही सवारी में दिखा राजस्थान का सांस्कृतिक वैभव

इस आयोजन की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि तीज का रंग केवल पारंपरिक परकोटे तक सीमित नहीं रहा। इस बार इसे डिजिटल विस्तार भी मिला, जिससे जयपुर का यह सांस्कृतिक उत्सव वैश्विक दर्शकों तक पहुंचा। उत्तर अमेरिका में बसे प्रवासी राजस्थानियों तक भी इसका लाइव प्रसारण पहुंचाया गया, जबकि जयपुर शहर के 13 प्रमुख स्थानों पर एलईडी स्क्रीन के माध्यम से लोगों ने शाही सवारी के दर्शन किए। यह पारंपरा और तकनीक का ऐसा संतुलित मेल था, जिसने उत्सव को अधिक समावेशी और व्यापक बना दिया।

पर्यटन विभाग के अनुसार, तीज माता की शाही सवारी जयपुर की जीवंत सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक है, जिसमें आस्था के साथ लोककला, संगीत, शौर्य और राजसी विरासत का प्रभावशाली मेल दिखाई देता है। यही कारण है कि यह आयोजन सिर्फ धार्मिक श्रद्धा का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रदर्शन और विरासत संरक्षण का भी महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।

लोक कलाकारों ने रचा रंग, सुर और परंपरा का जीवंत संसार

शाही सवारी के आगे बढ़ते ही जयपुर की गलियों में लोककलाओं का रंग और गहरा होता गया। कच्ची घोड़ी, कालबेलिया, चरी, घूमर, चंग-ढप, मांगणियार गायन, भपंग, रावणहत्था, कठपुतली और बहुरूपिया जैसी विविध लोक विधाओं ने इस आयोजन को जीवंत सांस्कृतिक उत्सव में बदल दिया। प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से आए करीब 175 लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों ने यह साबित किया कि राजस्थान की संस्कृति केवल संग्रहालयों की वस्तु नहीं, बल्कि आज भी सड़कों, चौकों और जन-उत्सवों में सांस लेती हुई परंपरा है।

घोड़ों और ऊंटों से सजे शाही लवाजमे ने इस सवारी में राजसी गरिमा का विशेष आयाम जोड़ा। लोकधुनों के बीच आगे बढ़ती पालकी और उसके आसपास उमड़ती भीड़ ने एक ऐसा दृश्य रचा, जिसमें श्रद्धा और सौंदर्य साथ-साथ दिखाई दिए। यही वह दृश्यात्मक शक्ति है, जो जयपुर की तीज को सामान्य उत्सव से अलग बनाती है।

शौर्य और स्त्री शक्ति की अलग छाप

तीज जैसे पारंपरिक उत्सव के बीच शौर्य सेवा संगठन की बालिकाओं द्वारा तलवारबाजी का प्रदर्शन विशेष आकर्षण बना। यह प्रस्तुति केवल कौशल का प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि राजस्थान की वीर परंपरा और महिला शक्ति के प्रतीकात्मक विस्तार के रूप में भी देखी गई। आस्था और उत्सव के बीच शौर्य का यह रंग आयोजन को और अधिक प्रभावशाली बनाता है।

आज के दौर में जब सांस्कृतिक आयोजनों की दृश्यात्मकता अक्सर मनोरंजन तक सीमित हो जाती है, तब ऐसे प्रदर्शन यह याद दिलाते हैं कि पारंपरिक पर्वों में सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश भी गहराई से निहित होते हैं।

छोटी चौपड़ की महाआरती ने बढ़ाई उत्सव की गरिमा

सवारी जब छोटी चौपड़ पहुंची, तो वहां तीज माता की महाआरती ने पूरे माहौल को भक्ति और उल्लास के स्वर से भर दिया। जेल बैंड और आरएसी बैंड की प्रस्तुतियों ने इस दृश्य को और अधिक आकर्षक बनाया, जबकि जयपुर व्यापार महासंघ की ओर से पुष्पवर्षा ने आयोजन में जनसहभागिता की छाप स्पष्ट कर दी।

इसके बाद शाही सवारी गणगौरी बाजार होते हुए तालकटोरा स्थित पौंड्रिक पार्क पहुंची, जहां कला मेले और लोक प्रस्तुतियों ने उत्सव को आगे बढ़ाया। इससे साफ दिखा कि यह आयोजन केवल एक मार्गीय शोभायात्रा नहीं, बल्कि बहुस्तरीय सांस्कृतिक अनुभव के रूप में विकसित हो चुका है।

जयपुर की तीज अब स्थानीय नहीं, वैश्विक सांस्कृतिक पहचान

अजमेरी गेट, न्यू गेट, मोती डूंगरी, रामबाग सर्किल, एसएमएस स्टेडियम, महाराजा कॉलेज, बिरला मंदिर, राजस्थान विश्वविद्यालय, राजस्थान कॉलेज, ओटीएस चौराहा और जवाहर सर्किल स्थित पत्रिका गेट समेत कई स्थानों पर एलईडी स्क्रीन के जरिए लाइव प्रसारण की व्यवस्था की गई। इससे वे लोग भी इस उत्सव से जुड़ सके, जो परकोटे तक नहीं पहुंच पाए।

उत्तर अमेरिका में बसे प्रवासी राजस्थानियों तक इसका प्रसारण पहुंचना इस आयोजन को एक नई सांस्कृतिक ऊंचाई देता है। जयपुर की तीज अब केवल शहर का उत्सव नहीं रही, बल्कि वह राजस्थान की वैश्विक सांस्कृतिक पहचान का विस्तार बनती दिखाई दे रही है।

परंपरा, पर्यटन और सार्वजनिक उत्सव का सफल संगम

पर्यटन विभाग के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लाइव स्ट्रीमिंग, ड्रोन से पुष्पवर्षा और देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए विशेष व्यवस्था – इन सबने यह स्पष्ट किया कि जयपुर की तीज अब विरासत आधारित सांस्कृतिक पर्यटन का मजबूत केंद्र बन चुकी है। महलों, अटारियों, झरोखों और हवेलियों से सवारी देखने के लिए उमड़ती भीड़ ने इस आयोजन की लोकप्रियता को और प्रमाणित किया।

जयपुर की तीज माता की राजसी सवारी दरअसल उस सांस्कृतिक आत्मविश्वास की प्रतीक है, जिसमें परंपरा केवल निभाई नहीं जाती, बल्कि पूरे गर्व और सौंदर्य के साथ सार्वजनिक रूप से जी जाती है। यही कारण है कि हर वर्ष यह उत्सव सिर्फ धार्मिक कैलेंडर की एक तिथि नहीं रहता, बल्कि शहर की आत्मा का सार्वजनिक उत्सव बन जाता है।

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Gargi Hada
Gargi Hadahttp://theharawal.com
Gargi Hada is a Spiritual Correspondent at TheHarawal.com. She covers Rajasthan’s spiritual traditions, ancient temples, religious heritage, sacred places, and the stories that shape its cultural identity. Through her writing, she explores the region’s faith, traditions, and timeless spiritual heritage for the modern reader.

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