राजस्थान। निकाय चुनाव के नतीजों के बीच सियासी पारा एक बार फिर चढ़ गया है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सत्तारूढ़ भाजपा पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि बोर्ड गठन के लिए निर्दलीय और विपक्षी पार्षदों को डेढ़ करोड़, दो करोड़ और ढाई करोड़ रुपये तक के प्रलोभन दिए जा रहे हैं। गहलोत का यह दावा राज्य की नगरीय राजनीति में नई बहस का विषय बन गया है।
मुख्य बिन्दु
- गहलोत ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में पार्षदों को करोड़ों का ऑफर देने का आरोप लगाया।
- दावे के मुताबिक ऑफर 1.5 करोड़, 2 करोड़ से लेकर 2.5 करोड़ रुपये तक के हैं।
- गहलोत के अनुसार, 309 निकायों में से 223 में भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला।
- मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े एक अधिकारी पर कलेक्टरों और एसडीएम पर दबाव डालने का आरोप।
- पुलिस के दुरुपयोग और बाड़ेबंदी वाले ठिकानों पर दबिश की बात भी कही गई।
आरोप क्या है? गहलोत के दावे की पूरी पड़ताल
पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीधे तौर पर कहा कि भाजपा बहुमत के गणित को नियंत्रित करने के लिए धनबल का सहारा ले रही है। उनके मुताबिक, निर्दलीय और कांग्रेस के पार्षदों को भाजपा के पक्ष में लाने के लिए रुपयों की पेशकश की जा रही है, जिसकी राशि एक करोड़ से ऊपर बताई गई है।
गहलोत ने दावे को मजबूत करने के लिए आंकड़े भी पेश किए। उन्होंने कहा कि 10,244 वार्डों में भाजपा 6,065 वार्डों में चुनाव हार गई। इसके अलावा 309 निकायों में से 223 में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। 10 नगर निगमों की बात करें तो भाजपा को केवल चार निगमों में बहुमत मिला है। गहलोत का तर्क है कि जनादेश स्पष्ट संदेश दे रहा है, लेकिन सत्ता पक्ष प्रशासनिक ताकत के दम पर बोर्डों पर कब्जा करने की कोशिश कर रहा है।
उन्होंने जोधपुर का उदाहरण देते हुए कहा कि कांग्रेस और भाजपा की स्थिति को लेकर जिस तरह का गणित बैठाया जा रहा है, उससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं।
प्रशासन पर दुरुपयोग का आरोप
गहलोत ने सिर्फ खरीद-फरोख्त तक सीमित नहीं रुके। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े एक आईएएस अधिकारी कलेक्टरों और एसडीएम पर भाजपा के पक्ष में बोर्ड बनवाने के लिए दबाव डाल रहे हैं। साथ ही, विपक्षी और निर्दलीय पार्षदों को पुलिस के जरिए डराने-धमकाने, बाड़ेबंदी वाले ठिकानों पर दबिश देने और उनके परिजनों पर दबाव बनाने की बात भी उन्होंने कही।
यह आरोप ऐसे समय आया है, जब प्रदेश में नगरीय निकायों के अध्यक्ष पद का चुनाव और बोर्ड गठन की प्रक्रिया सुर्खियों में है।
बाड़ेबंदी और ‘रिसोर्ट पॉलिटिक्स’ की पृष्ठभूमि
राजस्थान की सियासत में बाड़ेबंदी का इतिहास पुराना है। जब भी चुनावी नतीजे किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं देते, तब निर्दलीय और छोटे दलों के पार्षद निर्णायक साबित होते हैं। इस बार भी त्रिशंकु निकायों की संख्या बड़ी है, जिससे निर्दलीय पार्षदों की अहमियत कई गुना बढ़ गई है। यही वजह है कि दोनों प्रमुख दलों के बीच गणित और धनबल दोनों का खेल तेज हो गया है। इससे पहले भी कांग्रेस ने पार्षदों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें राज्य से बाहर शिफ्ट करने जैसे कदम उठाए थे।
सत्ता पक्ष का रुख
भाजपा ने इन आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी बताया है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने पहले भी कांग्रेस पर ‘आरोपों की राजनीति’ करने का आरोप लगाया है और विपक्ष को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरा है। दूसरी ओर, गहलोत ने सीएम के गृह क्षेत्र भरतपुर क्षैत्र के कई इलाकों का जिक्र करते हुए दावा किया कि प्रशासनिक तंत्र का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए हो रहा है।
कानूनी और चुनावी पहलू
ध्यान देने वाली बात यह है कि रिपोर्ट में चुनाव आयोग में औपचारिक शिकायत या किसी जांच की शुरुआत का सीधा जिक्र नहीं है। ऐसे मामलों में अगर पीड़ित पार्षद चुनाव आयोग या पुलिस में शिकायत दर्ज कराते हैं, तो ही कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ती है। फिलहाल यह आरोप और पलटवार तक सीमित दिख रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास बनाए रखने के लिए खरीद-फरोख्त की स्वतंत्र जांच और पारदर्शिता जरूरी है।
FAQs: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q1. गहलोत ने पार्षदों को कितने रुपये का ऑफर देने का दावा किया?
गहलोत के मुताबिक निर्दलीय और विपक्षी पार्षदों को भाजपा के पक्ष में लाने के लिए डेढ़ करोड़, दो करोड़ और ढाई करोड़ रुपये तक के ऑफर दिए जा रहे हैं।
Q2. यह आरोप किस चुनाव से जुड़ा है?
यह आरोप राजस्थान के नगरीय निकाय (नगर निगम, नगर पालिका आदि) चुनावों के नतीजों और बोर्ड गठन की प्रक्रिया से जुड़ा है।
Q3. गहलोत ने प्रशासन पर क्या आरोप लगाए?
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े एक अधिकारी कलेक्टरों और एसडीएम पर दबाव डाल रहे हैं, और पुलिस का इस्तेमाल पार्षदों को डराने के लिए किया जा रहा है।
Q4. क्या इस मामले में कोई जांच शुरू हुई है?
अभी तक सार्वजनिक रूप से चुनाव आयोग में शिकायत या औपचारिक जांच की पुष्टि नहीं हुई है।
आगे क्या?
निकायों के बोर्ड गठन और अध्यक्ष पद के चुनाव के साथ यह विवाद और गहरा सकता है। निर्दलीय पार्षदों का रुख आने वाले दिनों में निर्णायक होगा। अगर आरोपों पर औपचारिक शिकायत दर्ज होती है, तो मामला चुनाव आयोग से लेकर अदालत तक पहुंच सकता है। फिलहाल राज्य की राजनीति में यह मुद्दा दोनों दलों के लिए आमने-सामने की लड़ाई का नया मोर्चा बन गया है।