राजस्थान में बाघों के पुनर्बसाव की चर्चा आमतौर पर 2008 से जुड़ती है, लेकिन एक शोध-आधारित दावा डूंगरपुर को 1928 में ही इस पहल का अग्रदूत बताता है। यह कथा केवल वन्यजीव संरक्षण की नहीं, बल्कि राजधर्म, दूरदृष्टि और मर्यादित शौर्य की भी है। राजस्थान का पहला टाइगर रिलोकेशन 1928 में डूँगरपुर के महारावल लक्ष्मणसिंह जी ने कराया था
राजस्थान की धरती केवल दुर्गों, रणबांकुरों और राजवंशीय परंपराओं के लिए ही विख्यात नहीं रही, उसने प्रकृति-संरक्षण की ऐसी गाथाएं भी रची हैं, जिनका मूल्य समय बीतने के साथ और अधिक उज्ज्वल होता जाता है। बाघों के पुनर्बसाव, अर्थात टाइगर रिलोकेशन, की चर्चा जब भी होती है, सामान्यतः वर्ष 2008 और सरिस्का परियोजना का नाम सामने आता है। किंतु मेवाड़ अंचल से उठी एक ऐतिहासिक ध्वनि इस स्थापित धारणा को नया आयाम देती है। वन्यजीव इतिहास के शोधकर्ता प्रो. महेश शर्मा का दावा है कि राजस्थान का पहला टाइगर रिलोकेशन 2008 में नहीं, बल्कि वर्ष 1928 में डूंगरपुर रियासत में हुआ था।
यदि यह दावा आधिकारिक अभिलेखों और प्रामाणिक दस्तावेजों से पूर्णतः पुष्ट होता है, तो यह घटना केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि भारत के प्रारंभिक वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय सिद्ध हो सकती है। यही कारण है कि इस प्रसंग को मात्र एक रोचक इतिहास के रूप में नहीं, बल्कि नीति, परंपरा और राजधर्म के एक दुर्लभ संगम के रूप में देखा जाना चाहिए।
महारावल लक्ष्मणसिंह जी का दृष्टिकोण: शिकार से संरक्षण की ओर
इतिहास अक्सर राजाओं के शौर्य का लेखा देता है, परंतु किसी शासक का असली गौरव केवल रणक्षेत्र में नहीं, बल्कि उसकी दूरदृष्टि, अनुशासन और संरक्षण-नीति में भी निहित होता है। रिपोर्ट के अनुसार, डूंगरपुर रियासत के महारावल लक्ष्मण सिंह जी ने उस समय यह पहल की, जब अंग्रेजी प्रभाव और शिकार-प्रधान प्रवृत्ति के कारण क्षेत्र के अधिकांश बाघ समाप्त हो चुके थे। कहा जाता है कि मेयो कॉलेज में अध्ययनकाल के दौरान ही उन्होंने यह देखा-सुना कि ब्रिटिश प्रशासकीय व्यवस्था और शिकार के शौक ने जंगलों का संतुलन बिगाड़ दिया है। गद्दी संभालने के बाद उन्होंने इस स्थिति को नियति मानकर स्वीकार नहीं किया, बल्कि सुधार का मार्ग चुना।
यहीं डूँगरपुर की वह मर्यादित चेतना दिखाई देती है, जिसमें वन्यजीव केवल राजसी वैभव का प्रतीक नहीं, बल्कि प्राकृतिक राज्य-व्यवस्था का अंग माने जाते थे। यह दृष्टि आज के संरक्षण विमर्श में भी अनुकरणीय प्रतीत होती है।
1928 का वह साहसिक प्रयास, जब साधन सीमित थे लेकिन संकल्प अडिग
आज के युग में वन्यजीव रिलोकेशन आधुनिक तकनीक, ट्रैंक्विलाइजर, हेलीकॉप्टर, मेडिकल मॉनिटरिंग और प्रशिक्षित टीमों के सहयोग से किया जाता है। किंतु 1928 का भारत इन सुविधाओं से बहुत दूर था। ऐसे समय में ग्वालियर से बाघों का एक जोड़ा मंगवाकर डूंगरपुर के जंगलों में बसाने का प्रयास अपने आप में असाधारण माना जाएगा। खबर के अनुसार, इस जोड़े को पिंजरों में रेल से गुजरात के तलोद स्टेशन तक लाया गया, फिर बैलगाड़ी और ट्रक की मदद से डूंगरपुर पहुंचाया गया।
यह केवल परिवहन की कहानी नहीं है; यह उस राजसंकल्प की कथा है, जिसमें जंगल को फिर से उसका स्वाभाविक स्वामी लौटाने का प्रयत्न दिखाई देता है। सीमित संसाधनों के बीच ऐसी योजना का सोचना और उसे क्रियान्वित करना बताता है कि उस युग में भी संरक्षण केवल एक कल्पना नहीं, बल्कि राजकीय दायित्व के रूप में समझा जाता था।
डूंगरपुर से उठी वह परंपरा, जो आजादी तक जीवित रही
रिपोर्ट में उल्लेख है कि इस बाघ-जोड़े से बढ़ते-बढ़ते डूंगरपुर अंचल में आजादी के समय तक लगभग 25 बाघों का कुनबा बन गया था। यह तथ्य अभिलेखीय रूप से प्रमाणित होता है, तो इसका महत्व अत्यंत बड़ा है। यह संकेत देता है कि उस पहल ने केवल प्रतीकात्मक सफलता नहीं पाई, बल्कि जंगल के पारिस्थितिक जीवन में वास्तविक परिवर्तन भी उत्पन्न किया।
यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि संरक्षण की कोई भी योजना तभी सार्थक मानी जाती है, जब वह समय की कसौटी पर टिके। एक जोड़े से बढ़कर 25 तक पहुंचना केवल जीववैज्ञानिक घटना नहीं, बल्कि प्रबंधन, आवासीय अनुकूलता और वन्य संतुलन की सफलता का संकेत भी हो सकता है।
‘बोखा’ की कथा: शौर्य नहीं, करुणा और उत्तरदायित्व का प्रसंग
इस ऐतिहासिक प्रसंग का एक पक्ष और भी संवेदनात्मक है। खबर के अनुसार, उम्र बढ़ने और दांत टूटने से एक बाघ शिकार करने में असमर्थ हो गया था। उसके मानवभक्षी बनने की आशंका पर महारावल लक्ष्मणसिंह जी ने स्वयं उसे गोली मारकर पीड़ा से मुक्ति दी, और बाद में उसकी स्मृति में उसे संरक्षित भी रखा गया, जिसे स्थानीय लोग “बोखा” के नाम से जानते हैं।
इस घटना को केवल शक्ति-प्रदर्शन के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। यह एक कठिन, उत्तरदायी और संवेदनशील निर्णय की तरह देखी जानी चाहिए-जहां शासक को जंगल, जन और जीव-तीनों के बीच संतुलन साधना पड़ता है। यही मर्यादा क्षत्रिय आचरण का उच्चतर रूप है: केवल पराक्रम नहीं, बल्कि स्थितियों के अनुरूप धर्मसंगत निर्णय।
क्यों महत्वपूर्ण है यह कथा आज के राजस्थान के लिए
आज जब वन्यजीव संरक्षण पर आधुनिक संस्थाएं, अंतरराष्ट्रीय मानक और वैज्ञानिक परियोजनाएं चर्चा के केंद्र में हैं, तब डूंगरपुर की यह कथा हमें बताती है कि भारत की रियासतों में भी संरक्षण का एक विचारशील इतिहास मौजूद था। यह इतिहास न तो प्रचार से बना था, न अनुदानों से; यह उत्तरदायित्व, क्षेत्रीय समझ और सत्ता के नैतिक उपयोग से उपजा था।
डूंगरपुर का यह संदर्भ इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह राजपुताना की उस विरासत को सामने लाता है, जिसमें भूमि, लोक और वन-तीनों के प्रति दायित्व को शासन का स्वाभाविक अंग माना जाता था। ऐसी कहानियां वर्तमान पीढ़ी को यह समझने में सहायता करती हैं कि परंपरा का अर्थ केवल अतीत का गौरव गान नहीं, बल्कि दूरदर्शी व्यवस्था भी है।
निष्कर्ष
डूंगरपुर की यह कथा केवल बाघों के पुनर्बसाव की कहानी नहीं है; यह उस दृष्टि की स्मृति है, जिसमें शासन का अर्थ संरक्षण, संतुलन और उत्तरदायित्व भी था। 1928 में डूंगरपुर में बाघों का पुनर्बसाव हुआ था, यह राजस्थान के इतिहास का एक ऐसा पृष्ठ है, जिसे नए सम्मान के साथ पढ़ा जाना चाहिए। इसमें न केवल राजसी संकल्प की छाप है, बल्कि उस मर्यादित क्षत्रिय चेतना की भी झलक है, जो शक्ति को संरक्षण के लिए प्रयोग करना जानती थी।
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