डिग्रियों के ढेर, फॉर्मों की कतारें, कोचिंग की जेलें और भविष्य के नाम पर फैलती हुई एक सामूहिक बेचैनी
भारत आज दुनिया के सामने अपनी सबसे बड़ी ताकत के रूप में अपने युवाओं को पेश करता है। यह बात कागज़ पर सच भी लगती है। आबादी जवान है, आकांक्षाएँ बड़ी हैं, डिजिटल पहुँच तेज़ है, और हर साल लाखों-करोड़ों नौजवान अपने हिस्से का आसमान माँगते हुए श्रम-बाज़ार की चौखट पर दस्तक दे रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि इस देश के सामने संकट सिर्फ नौकरियों की संख्या का नहीं है; उससे बड़ा संकट दिशा का है। नौकरी नहीं है – यह समस्या है। पर उससे भी बड़ी समस्या यह है कि जिन्हें नौकरी चाहिए, उन्हें यह भी साफ़ नहीं कि वे किस दिशा में जाएँ, किस कौशल पर भरोसा करें, किस संस्थान पर विश्वास करें, और किस वादे को सच मानें।
भारत के युवाओं के साथ इस समय सबसे बड़ा अन्याय सिर्फ बेरोज़गारी नहीं कर रही; दिशाहीनता कर रही है।
हमने एक पूरी पीढ़ी को यह समझाकर बड़ा किया कि पढ़ लो, परीक्षा दे दो, डिग्री ले लो, फिर दुनिया तुम्हारे लिए खुल जाएगी। अब वही पीढ़ी फॉर्म भर रही है, परीक्षा तारीख़ें देख रही है, पेपर लीक झेल रही है, रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रही है, इंटरव्यू के नाम पर अपमान सह रही है, और अंत में या तो किसी असंगत काम में धकेल दी जा रही है या फिर “कुछ तो कर रहे हैं” वाली सामाजिक सांत्वना पर छोड़ दी जा रही है। यह केवल आर्थिक समस्या नहीं है; यह राष्ट्रीय ईमानदारी का प्रश्न है।
ILO की India Employment Report 2024 बताती है कि युवाओं की बेरोज़गारी 2000 के 5.7% से बढ़कर 2019 में 17.5% तक पहुँची थी; 2023 में इसमें गिरावट आई और यह लगभग 10% रही, लेकिन संकट खत्म नहीं हुआ। रिपोर्ट का सबसे चुभता हुआ तथ्य यह है कि graduates के बीच बेरोज़गारी 29.1% तक दर्ज की गई, और female graduates के बीच यह 34.5% तक पहुँची। इससे भी गंभीर बात यह है कि बड़ी संख्या में technically qualified युवा ऐसे कामों में जा रहे हैं जो उनकी योग्यता से मेल ही नहीं खाते।
यानी यह देश सिर्फ नौकरियाँ पैदा करने में पीछे नहीं है; यह अपने पढ़े-लिखे युवाओं को उनकी शिक्षा के अनुरूप रास्ता देने में भी विफल हो रहा है।
सरकारें अक्सर आँकड़ों का एक आरामदेह संस्करण पेश करती हैं – और यह सच है कि PLFS 2025 के अनुसार youth unemployment rate में कुछ सुधार दर्ज हुआ है; 15-29 आयु वर्ग के युवाओं में यह 9.9% तक आया, ग्रामीण युवाओं में 8.3% और शहरी युवाओं में 13.6% रहा। यह सुधार स्वागतयोग्य है, लेकिन यह कहानी का पूरा सच नहीं है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि कितने लोग “काम” में हैं; सवाल यह है कि वे किस तरह के काम में हैं, किस वेतन पर हैं, कितनी स्थिरता के साथ हैं, और क्या वह काम उनके भविष्य का निर्माण करता है या सिर्फ आज की विवशता का प्रबंधन करता है।
युवाओं को आंकड़ों से नहीं, जीवन की वास्तविकताओं से फर्क पड़ता है।
उनके लिए “employment” और “livelihood” एक ही चीज़ नहीं हैं।
किसी ऐप के लिए घंटों दौड़ना, अस्थायी अनुबंध पर जीना, कम वेतन में overqualified होकर काम करना, या परिवार के दबाव में अनिश्चित प्रतियोगी परीक्षाओं के दलदल में फँसे रहना – यह सब सिर्फ “रोज़गार” नहीं कहलाया जा सकता। यह कई बार जीविका है, कई बार समझौता है, और कई बार पराजय को भाषा बदलकर छिपा देना है।
World Bank ने हाल में कहा कि भारत में बेरोज़गार आबादी का लगभग 72% हिस्सा युवा हैं, और हर साल 12 million से अधिक लोग श्रम-बाज़ार में प्रवेश कर रहे हैं। वही बयान यह भी स्वीकार करता है कि skills mismatch गहरा है – यानी जो प्रशिक्षण युवाओं को दिया जा रहा है, वह कंपनियों और उद्योग की ज़रूरतों से मेल नहीं खाता। यह केवल training infrastructure की विफलता नहीं; यह policy imagination की विफलता है।
भारत का युवा आज चार तरफ़ से घिरा हुआ है।
एक तरफ़ परिवार है, जो अब भी “सरकारी नौकरी” को अंतिम मुक्ति मानता है।
दूसरी तरफ़ बाज़ार है, जो “skill”, “startup”, “creator economy”, “AI future” जैसे चमकीले शब्दों से बेचैनी पर पॉलिश चढ़ाता है।
तीसरी तरफ़ शिक्षा व्यवस्था है, जो syllabus बदलती है लेकिन दिशा नहीं देती।
और चौथी तरफ़ राजनीति है, जो युवाओं को नागरिक कम, नारा ज़्यादा समझती है।
यह विडंबना नहीं, विफलता है कि देश का सबसे ऊर्जावान वर्ग या तो coaching hostels में बंद है, या exam notifications के पीछे भाग रहा है, या फिर social media पर motivational language के सहारे अपने भीतर के भय को ढँकने की कोशिश कर रहा है। हम उनसे कह रहे हैं: “मेहनत करो।” लेकिन हम यह नहीं बता रहे कि मेहनत किस दिशा में करे। हम उनसे कह रहे हैं: “स्किल सीखो।” लेकिन हम यह सुनिश्चित नहीं कर रहे कि वह स्किल बाज़ार में सम्मानजनक अवसर में बदले। हम उनसे कह रहे हैं: “आत्मनिर्भर बनो।” लेकिन आर्थिक संरचना अब भी बड़े पैमाने पर low-quality, informal और असुरक्षित काम पर टिकी हुई है। ILO के अनुसार भारत की workforce का बहुत बड़ा हिस्सा informal काम में है, और लगभग 90% रोजगार informal nature का है।
युवा भारत को केवल vacancy नहीं चाहिए; उसे विश्वसनीय रास्ता चाहिए।
उसे सिर्फ placement नहीं चाहिए; उसे purpose चाहिए।
उसे सिर्फ training certificate नहीं चाहिए; उसे ऐसी तैयारी चाहिए जो जीवन, काम और समाज – तीनों में उसे खड़ा कर सके।
आज इस देश का एक बड़ा युवा वर्ग पढ़ा-लिखा है, connected है, ambitious है – लेकिन internally disoriented है। यही disorientation सबसे खतरनाक है। बेरोज़गारी से क्रोध पैदा होता है; दिशाहीनता से क्षय। बेरोज़गारी आदमी को लड़ने पर मजबूर करती है; दिशाहीनता धीरे-धीरे उसके आत्मविश्वास, उसके निर्णय, उसके नैतिक साहस और उसके भविष्य की कल्पना – सबको खोखला कर देती है।
इसलिए सवाल अब यह नहीं रह गया कि भारत के युवाओं के लिए नौकरी कहाँ है।
सवाल यह है कि भारत अपने युवाओं को किस तरह का भविष्य देना चाहता है?
अगर उत्तर सिर्फ इतना है कि कुछ सरकारी योजनाएँ, कुछ skill centres, कुछ startup slogans और कुछ placement मेलों से काम चल जाएगा, तो यह आत्म-छल है। देश को अपने युवाओं के लिए तीन कठोर सच्चाइयाँ स्वीकार करनी होंगी।
पहली – शिक्षा और रोजगार के बीच का पुल टूटा हुआ है।
दूसरी – सम्मानजनक नौकरियों की कमी को “opportunity” कहकर नहीं छिपाया जा सकता।
तीसरी – परीक्षा-केन्द्रित आकांक्षा ने युवाओं की कल्पनाशक्ति को बहुत संकरा कर दिया है।
हमें ऐसी राष्ट्रीय बहस चाहिए जिसमें युवा सिर्फ “labour supply” न हों, बल्कि नीति के केंद्र में रखे गए नागरिक हों। स्कूल से ही career literacy, apprenticeship culture, local industry linkages, dignified vocational pathways, mental health support, entrepreneurship mentoring, civic education और technology-ready but humane skilling – यह सब एक integrated national mission का हिस्सा बनना चाहिए। नहीं तो हम दुनिया को demographic dividend का भाषण देते रहेंगे और भीतर ही भीतर अपनी सबसे बड़ी पूँजी को exhaustion, confusion और resentment में धकेलते रहेंगे।
भारत को इंजीनियर, coder, nurse, welder, designer, technician, researcher, teacher, farmer-entrepreneur, climate worker, care worker – सब चाहिए। पर उससे पहले भारत को यह ईमानदारी चाहिए कि वह अपने युवाओं से झूठ बोलना बंद करे। हर डिग्री नौकरी नहीं देती। हर परीक्षा merit का मंदिर नहीं है। हर skill centre भविष्य की गारंटी नहीं है। हर motivational speech जीवन की दिशा नहीं बनती।
राष्ट्र निर्माण का पहला नियम है:
जिस पीढ़ी से आप भविष्य की उम्मीद रखते हैं, उसे भ्रम नहीं, मार्ग दीजिए।
आज का युवा केवल earning machine नहीं है। वह अर्थ की तलाश में भी है। वह काम के साथ पहचान चाहता है। आय के साथ सम्मान चाहता है। अवसर के साथ न्याय चाहता है। और यह माँग अनुचित नहीं है; यही आधुनिक नागरिकता की सबसे बुनियादी माँग है।
भारत यदि सचमुच विकसित राष्ट्र बनना चाहता है, तो उसे यह समझना होगा कि युवा नीति का विषय नहीं, राष्ट्र का स्वरूप हैं।
उन्हें सिर्फ रोजगार देना काफी नहीं होगा।
उन्हें दिशा देनी होगी।
स्पष्ट, विश्वसनीय, न्यायपूर्ण दिशा।
वरना होगा यह कि देश के शहर चमकते रहेंगे, GDP की सुर्खियाँ बनती रहेंगी, डिजिटल इंडिया के मंच सजते रहेंगे – लेकिन भीतर से एक पीढ़ी अपने ही भविष्य पर से भरोसा खोती जाएगी।
और जिस राष्ट्र का युवा अपने भविष्य पर से भरोसा खो दे, वह राष्ट्र देर-सवेर अपने वर्तमान की सारी चमक खो देता है।
रोज़गार पेट भर सकता है, पर दिशा ही राष्ट्र बनाती है।
इसे भी पढ़ें –