Ramsa Peer: बाबा रामदेवजी के जीवन से जुड़े अद्भुत चमत्कार, जानिए क्यों कहलाते हैं लोक देवता

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Ramsa Peer: बाबा रामदेवजी के जीवन से जुड़े अद्भुत चमत्कार, जानिए क्यों कहलाते हैं लोक देवता
हरावल

बाबा रामदेवजी – जिन्हें रामदेव पीर, रामसा पीर और रूणिचा राय के नाम से भी पूजा जाता है – राजस्थान के सबसे लोकप्रिय लोकदेवताओं में से एक हैं। उनकी खासियत यह है कि यहां हिंदू और मुस्लिम – दोनों समुदाय के श्रद्धालु एक ही चूल्हे से खाते हैं, एक ही समाधि पर मत्था टेकते हैं। यह धार्मिक सद्भाव की जीवंत मिसाल है।

जहां लोक-आस्था के पन्ने खुलते हैं

राजस्थान के जैसलमेर जिले का रामदेवरा (रुणिचा) – यह वह धरती है, जहां 14वीं शताब्दी में समाज-सुधारक, संत और लोकदेवता बाबा रामदेव जी महाराज ने अवतार लिया था। हिंदू उन्हें रामदेवजी और मुस्लिम समुदाय उन्हें रामसा पीर के नाम से श्रद्धा भाव से पुकारता है। लोक मान्यता है कि बाबा रामदेव भगवान कृष्ण के अवतार थे – उनका जन्म विक्रम संवत 1409 (सन् 1352 ईस्वी) में भादो मास शुक्ल पक्ष दूज (भाद्रपद शुक्ल द्वितीया) के दिन, पश्चिम राजस्थान के पोकरण के पास रुणिचा गांव में, तंवर वंशीय राजपूत अजमाल जी के घर हुआ था।

“पाबू जी हडू, रामदे जी मांगाळिया मेहा। पांचू पीर पधारजौ, ए गोगाजी जेहा।” – इस लोक पंक्ति में बाबा को गोगाजी (महाराजा गुग्गा) के समकक्ष रखा गया है, जो स्वयं सर्वकालिक आस्था का प्रमाण है।

बाबा रामदेव जी के जीवन से जुड़े 24 परचे (चमत्कार) का उल्लेख उनके भजनों, लोकगीतों और लोककथाओं में व्यापक रूप से मिलता है। इन्हीं परचों की कथाओं को आज भी मेगामेले के भजनों और “हरजस” के रूप में गाया जाता है। प्रस्तुत है लोक-स्रोतों में मिले प्रमुख परचों की स्वरचित प्रस्तुति – जिन्हें जीवन के विभिन्न पड़ावों के अनुसार क्रमबद्ध किया गया है।

1. बाल लीला में माता मैणादे को परचा

लोककथा के अनुसार, बचपन में एक दिन माता मैणादे दूध का बर्तन चूल्हे पर चढ़ाकर अन्य काम में लग गईं। बालक रामदेव जी अपनी माता को चमत्कार दिखाने के लिए अपने साथी विरमदेव (चाचा) के गाल पर चुमटी भरते रहे। ज्यों-ही माता दूध गिरता देखती हैं और बालक को गोदी से नीचे उतारना चाहती हैं, उतने में ही रामदेव जी अपना हाथ दूध की ओर करके अपनी दिव्य शक्ति से उस बर्तन को चूल्हे से नीचे धर देते हैं – दूध की एक बूंद भी नहीं गिरती।

“ज्यों-ही माता दूध गिरता देखती हैं, उतने में ही रामदेवजी अपना हाथ दूध की ओर करके उस बर्तन को चूल्हे से नीचे धर देते हैं।” – लोक-कथा

2. कपड़े के घोड़े का परचा

पांच वर्ष की आयु में रामदेव जी राजदरबार में पहुंचे। दर्जी द्वारा बनाए गए कपड़े के घोड़े पर सवार होते ही वह घोड़ा जीवंत हो उठा – हिनहिनाने लगा, नाचने लगा और आगे के दोनों पैर खड़े होकर दरबार में ही नाचने लगा। नाचते-नाचते बालक को लेकर आकाश मार्ग की ओर घोड़ा उड़ चला। यह दृश्य देखकर सारा दरबार चकित रह गया।

“कपड़े के घोड़े को नाचता देखकर सारा दरबार हिनले लगा। नाचते नाचते बालक को लेकर आकाश मार्ग की ओर घोड़ा उड़ चला।”

3. रूपा दर्जी को परचा

रूपा दर्जी ने रामदेव जी की परीक्षा लेने के लिए कीमती कपड़ों की जगह चिथड़ों का घोड़ा बनाकर भेजा था। बाबा ने उसे सबक सिखाया – जिस समय रूपा दर्जी को अपनी भूल का एहसास हुआ, उसी क्षण कपड़े का घोड़ा हिनहिनाकर सच्ची शक्ति का परिचय दे देता है।

4. लाखु (लक्खी) बंजारे का परचा

लाखु बंजारे की मिश्री को रामदेव जी ने नमक में बदल दिया था, जब उसने बाबा के आगे अहंकार किया था। पश्चाताप करने पर बाबा की कृपा से पुनः मिश्री बन गई।

5. भैरव राक्षस का वध

भैरव नाम के एक राक्षस ने पोकरण क्षेत्र में 36 कोस तक आतंक मचा रखा था। वह इंसानों को मार देता था, परंतु बाबा के गुरु बालीनाथ जी के तप से वह राक्षस डरता था। बाबा रामदेव जी बालीनाथ जी के धूणे (गुदड़ी) में छुपकर बैठ गए। जब भैरव राक्षस आया और उसने गुदड़ी खींची, तब अवतारी रामदेवजी को देखकर वह अपनी पीठ दिखाकर भागने लगा और कैलाश टेकरी के पास गुफा में जा घुसा। वहीं रामदेवजी ने घोड़े पर बैठकर उसका वध कर दिया, जिससे पोकरण-क्षेत्र भयमुक्त हो गया।

6. सेठ बोहिताराज को परचा – परचा बावड़ी का निर्माण

मान्यता है कि रुणिचा के सेठ बोहिताराज (सेठ बोहिताजी) का जहाज समुद्र में तूफान के कारण डूब रहा था। बाबा ने अलौकिक चमत्कार दिखाकर उसकी नाव को बचाया। पश्चाताप करते हुए सेठ ने रामदेव जी से माया खर्च करने का आदेश मांगा। रामदेव जी ने कहा –

“तुम रूणिचा में एक बावड़ी खुदवा दो। उस बावड़ी का पानी मीठा होगा, लोग इसे परचा बावड़ी के नाम से पुकारेंगे और इसका जल गंगा के समान पवित्र होगा।”

इसी आदेशानुसार परचा बावड़ी का निर्माण करवाया गया, जो मंदिर के समीप ही स्थित है। इस बावड़ी का जल आज भी बाबा के निज मंदिर में अभिषेक के काम में लाया जाता है।

7. पांच पीरों से मिलन – “रामापीर” की उपाधि

रामदेव जी की परीक्षा लेने के लिए मक्का-मदीना से पांच पीर रामदेवरा आए। उन्होंने अपने घर मेहमान बनकर शर्त रखी कि वे स्वयं के कटोरों में ही भोजन करेंगे, जो वे मक्का में भूलकर आए थे। रामदेव जी ने वहीं बैठे-बैठे अपनी दाईं भुजा को इतना लंबा फैलाया कि मदीना से उनके कटोरे वहीं मंगवा दिए। यह चमत्कार देखकर पीर दंग रह गए, उनके चरणों में गिर गए और उन्होंने बाबा को “रामापीर” की उपाधि दी। तभी से वे “पीरों के पीर” और “रामसा पीर” के नाम से पूजे जाने लगे।

इसी घटना की याद में पंच पीपली (पांच पीपल) का स्थान प्रसिद्ध हुआ – रामदेवरा से पूर्व की ओर लगभग 10 किलोमीटर, एकांत गांव के पास छोटी-सी नाडी के पाल पर, पीरों ने परचे स्वरूप पांच पीपलियां लगाई थीं, जो आज भी मौजूद हैं। बाबा रामदेव जी के 24 परचों में यह स्थल भी प्रसिद्ध है।

8. जाम्भोजी (जाम्भजी) को परचा

लोकमान्यता के अनुसार, जाम्भोजी के साथ तालाब के जल को लेकर चमत्कार का प्रसंग भी जुड़ा है – जब जल की कमी के दिनों में बाबा ने अपनी दिव्य शक्ति से जल संकट दूर किया था।

9. खाती पुत्र सारथीया को पुनर्जीवित किया

बाबा के मित्र खाती के पुत्र सारथीया की मृत्यु हो गई थी। भक्तों के विलाप पर बाबा ने अपने दिव्य परचे से उसे पुनर्जीवित कर दिया था।

10. पूंगलगढ़ के पड़िहारों को परचा

पूंगलगढ़ के किले के पड़िहारों (रक्षकों) ने बाबा पर तोपों के गोले दागे थे। बाबा ने अपने चमत्कार से उन तोप के गोलों को फूलों में बदल दिया और शत्रुता का भाव शांत कर दिया।

11. मुस्लिम बादशाह को परचा

एक मुस्लिम बादशाह ने बाबा की परीक्षा लेने के लिए तलवारों की माला भेजी थी। बाबा ने उन तलवारों को फूलों की माला में बदलकर लौटा दिया, जिसे देखकर बादशाह आस्तिन पास्त हो गया और बाबा के चरणों में गिर गया।

12. सालियों को परचा

सालियों (बहनों) ने बाबा के ऊपर ढकी गई मरी हुई बिल्ली को बाबा ने जीवित कर दिया था – यह प्रसंग भी लोककथाओं में प्रसिद्ध है।

13. रानी नेतल को परचा – पंगुता दूर करना

अमरकोट (सिंध) के राजा दलजी सोढा की पुत्री रानी नेतलदे का विवाह रामदेव जी के साथ हुआ था। रानी पंगु (अपंग) थीं। बाबा ने अपने परचे से उनकी पंगुता दूर कर उन्हें स्वस्थ कर दिया था। इसी प्रसंग के आधार पर आज भी मान्यता है कि रामदेवरा में अपंगता से पीड़ित भक्तों को स्वास्थ्य लाभ होता है।

14. मेवाड़ के सेठ दलाजी को परचा

मेवाड़ के सेठ दलाजी निस्संतान थे। बाबा ने उन्हें संतान प्राप्ति का आशीर्वाद दिया था। साथ ही एक प्रसंग में सेठ दलाजी का कटा हुआ सिर जोड़कर उन्हें पुनर्जीवित भी किया गया था – यह कथा भी लोक-ख्यातियों में विख्यात है।

15. भाभी को परचा – मरे हुए बछड़े का जीवित होना

भाभी ने बचपन में बाबा के साथ खेलते समय उनकी परीक्षा ली थी। बाद के जीवन में बाभी (भाभी) के घर मरा हुआ बछड़ा बाबा के परचे से जीवित हो उठा था।

16. गंगासिंह / अजमाल सिंह से जुड़ा प्रसंग – संतान प्राप्ति

बाबा के आशीर्वाद से अनेक निस्संतान भक्तों – जिनमें अजमाल सिंह (रुणिचा के तंवर राजपूत परिवार के पूर्वज) की संतति भी शामिल है – को संतान प्राप्ति हुई। इसी वंश में विक्रम संवत 1409 को बाबा रामदेव जी का अवतरण माना जाता है।

क्या बाबा रामदेव जी के वास्तव में 24 परचे थे?

स्थानीय लोक-स्रोतों, भजनों और लोककथाओं में 24 परचों का समग्र उल्लेख व्यापक रूप से मिलता है, जिन्हें आज भी “हरजस” के रूप में गाया जाता है। इन परचों की संख्या और नाम विभिन्न लोक-परंपराओं में भिन्न-भिन्न रूपों में पाए जाते हैं। यह लेख उन स्रोतों में मिले 17 प्रमुख प्रसंगों की स्वरचित प्रस्तुति है – जिनमें से कई परचे एक-दूसरे के पर्याय या संयुक्त रूप हैं।

FAQs: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्र. बाबा रामदेव जी का जन्म कब और कहां हुआ था?
उ. लोकमान्यता के अनुसार उनका जन्म विक्रम संवत 1409 (सन् 1352 ईस्वी) में, भादो मास शुक्ल पक्ष दूज के दिन, पश्चिम राजस्थान के पोकरण के पास रुणिचा नामक स्थान में, तंवर वंशीय राजपूत अजमाल जी के घर हुआ था।

प्र. हिंदू और मुस्लिम दोनों बाबा को क्यों पूजते हैं?
उ. हिन्दू उन्हें रामदेवजी और मुस्लिम उन्हें रामसा पीर कहते हैं। दोनों समुदायों के लोग उन्हें समान आस्था से पूजते हैं – यही उनकी सांप्रदायिक सद्भाव के देवता होने की वजह है।

प्र. परचा बावड़ी का क्या महत्व है?
उ. रामदेवरा (रुणिचा) की परचा बावड़ी अपनी स्थापत्य कला में बेजोड़ मानी जाती है। मान्यता है कि इसका जल शुद्ध व मीठा है और इसका उपयोग बाबा के निज मंदिर में अभिषेक के लिए किया जाता है।

प्र. डाली बाई कौन थीं?
उ. डाली बाई बाबा की भक्त थीं, जिनकी समाधि रामसरोवर तालाब के पास स्थित है। उनकी याद में बना पत्थर का कंगन भी मंदिर परिसर में है, जिसके प्रति धर्मालुओं में गहरी आस्था है।

प्र. बाबा रामदेव जयंती कब मनाई जाती है?
उ. प्रतिवर्ष भादो मास शुक्ल पक्ष दूज (भाद्रपद शुक्ल द्वितीया) को बाबा का जन्मदिवस – रामदेव जयंती – धूमधाम से मनाई जाती है। रामदेवरा में विशाल मेला लगता है, जहां लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं।

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