उदयपुर। झीलों की नगरी उदयपुर की पहचान सिर्फ शानदार महलों और सुंदर झीलों से नहीं, बल्कि उन जीवंत परंपराओं से भी है, जो सवा सदी बाद भी उतने ही उल्लास के साथ कायम हैं। उन्हीं में एक है हरियाली अमावस्या का ऐतिहासिक मेला – जहां दूसरे दिन पूरा मैदान सिर्फ महिलाओं के नाम हो जाता है और पुरुषों के लिए ‘नो एंट्री’ का बोर्ड लग जाता है। सावन की हरियाली के बीच फतहसागर की पाल से लेकर सहेलियों की बाड़ी मार्ग तक महिलाओं का रेलमपेल देखते ही बनता है – कोई परिवार के साथ आया है, कोई सहेलियों के संग, और हर तरफ खुशी का माहौल है।
सुहावने मौसम में सजी सखियों की महफिल
इस साल भी मेले ने अपने दूसरे दिन पूरी तरह महिलाओं का रंग दिखाया। शहर से लेकर आसपास के गांवों तक से बड़ी संख्या में महिलाएं पहुंची हैं। सुहावने मौसम के बीच दोपहर से ही भीड़ उमड़ने लगी और शाम होते-होते मेला खचाखच भर गया। मेले में झूलों का जादू, पारंपरिक पकवानों की महक और खरीदारी का उत्साह – तीनों एक साथ देखने को मिले। पुरानी पीढ़ी से लेकर बच्चों तक ने चकरी-डोलर और झूलों का मजा लिया।
मेले की थाली – पारंपरिक स्वादों का अड्डा
| पकवान | खासियत |
|---|---|
| मालपुआ | मेले की पहचान; इसे ‘काली रोटी’ भी कहते है |
| खस्ता पापड़ी | कुरकुरी चाट का स्वाद |
| पकौड़ी | बरसात के मौसम का साथी |
| घेवर | सावन की मिठास का प्रतीक |
| आइसक्रीम | बच्चों से लेकर बड़ों तक की पसंद |
महिलाएं घरों से खीर बनाकर भी लाती हैं और मेले में ताजा मालपुए चटकारे लगाकर खाती हैं – यह परंपरा आज भी वैसी ही जीवंत है।
1899 से चली आ रही अनोखी परंपरा
इस मेले की शुरुआत को लेकर इतिहास के पन्नों में 1898 और 1899 दोनों वर्षों का उल्लेख मिलता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, महाराणा फतह सिंह जी के काल में फतहसागर झील के लबालब भरने की खुशी में मेले का आगाज़ हुआ। कहा जाता है कि महाराणा अपनी महारानी चावड़ी जी के साथ झील पर पहुंचे थे, और महाराणी जी की इच्छा पर मेले का दूसरा दिन महिलाओं के लिए निर्धारित कर दिया गया।
अगले ही साल से चावडी रानी जी ने महिलाओं के लिए अलग मेला लगवाने की शुरुआत की। शुरुआती दिनों में राजदरबार से हलवाइयों को सामान देकर मालपुए बनवाए जाते थे, इसलिए इसे ‘मालपुए का मेला’ भी कहा जाता था। यही परंपरा आगे चलकर ‘सखियों का मेला’ कहलाई – जो आज 125 साल बाद भी देश के अनूठे मेलों में अपनी अलग पहचान रखती है।
मेले के दो दिन – कब किसका संसार?
| दिन | प्रवेश | खासियत |
|---|---|---|
| पहला दिन | सभी के लिए खुला | झूले, दुकानें, खान-पान के स्टॉल; परिवारों की भीड़ |
| दूसरा दिन | सिर्फ महिलाएं, पुरुष प्रवेश वर्जित | सखियों की महफिल, पारंपरिक परिधानों में महिलाएं, खरीदारी व मेल-मिलाप |
दूसरे दिन सहेलियों की बाड़ी मार्ग से फतहसागर पाल तक का पूरा इलाका महिलाओं के कब्जे में रहता है। यही वो दिन है, जब पूरा मेला दुल्हन की तरह सजी महिलाओं से गुलज़ार हो जाता है।
सिर्फ मेला नहीं, महिलाओं का अपना सामाजिक स्पेस
इस परंपरा की सबसे बड़ी खासियत केवल पुरुषों की ‘नो एंट्री’ नहीं है। दरअसल, यह उस दौर की सामाजिक सोच की दस्तावेज है, जब महिलाओं के लिए सार्वजनिक आयोजनों में स्वतंत्र स्थान की कल्पना भी सहज नहीं थी। रियासतकालीन मेवाड़ में महिलाओं के लिए मेले का पूरा दिन निर्धारित होना आज भी महिला सामाजिक सहभागिता की ऐतिहासिक मिसाल माना जाता है। भारत की आधिकारिक पर्यटन वेबसाइट के अनुसार, हरियाली अमावस्या मेला इस क्षेत्र का एकमात्र ऐसा मेला है, जहां दूसरे दिन प्रवेश सिर्फ महिलाओं और बालिकाओं के लिए आरक्षित रहता है।
व्यवस्था में कोई कसर नहीं छोड़ी
इतनी बड़ी भीड़ के बीच प्रशासन की तैयारियां भी चाक-चौबंद नजर आईं। मेले में सुरक्षा और सफाई का खास इंतजाम किया गया:
सुरक्षा व सुविधा व्यवस्था
| व्यवस्था | विवरण |
|---|---|
| सुरक्षा बल | हर 100 मीटर पर पुलिसकर्मी तैनात |
| सफाई | नगर निगम के कर्मचारी लगातार सफाई व्यवस्था संभालते रहे |
| प्रवेश नियंत्रण | महिला दिवस पर पुरुषों के प्रवेश पर सख्त प्रतिबंध |
| मार्ग | सहेलियों की बाड़ी से फतहसागर पाल तक पूरा रास्ता मेले में शामिल |
पर्यटन की नजर से: 4 से 5 लाख तक की भीड़ का अनुमान
राजस्थान पर्यटन के अनुसार, हरियाली अमावस्या मेले में 4 से 5 लाख तक मेलार्थियों के पहुंचने का अनुमान लगाया जाता है। यही भीड़ और महिला दिवस की अनूठी भागीदारी इस आयोजन को उदयपुर के सबसे खास सांस्कृतिक उत्सवों में शामिल करती है। हरियाली अमावस्या अब सिर्फ मनोरंजन की महफिल नहीं, बल्कि मेवाड़ की लोक संस्कृति, सावन की परंपरा और रियासतकालीन विरासत का जीवंत दस्तावेज है। लाखों महिलाओं की खनकती चूड़ियों और हंसी-ठिठोली के बीच यह मेला झीलों की नगरी की आत्मा को सबके सामने उकेरता है।
FAQs:अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. हरियाली अमावस्या के मेले में पुरुषों की नो एंट्री क्यों है?
यह मेले के दूसरे दिन की प्राचीन परंपरा है। 1899 में महाराणा फतह सिंह के काल में महारानी चावड़ी की इच्छा से मेले का दूसरा दिन महिलाओं के लिए निर्धारित कर दिया गया था, जो आज तक कायम है।
2. यह परंपरा कितनी पुरानी है?
यह परंपरा लगभग 125 साल पुरानी है – मेले की शुरुआत 1898-99 के आसपास मानी जाती है।
3. महिला दिवस पर मेला कहां तक फैला रहता है?
सहेलियों की बाड़ी मार्ग से लेकर फतहसागर की पाल तक पूरा इलाका मेले में शामिल रहता है।
4. मेले को ‘मालपुए का मेला’ क्यों कहा जाता है?
रियासतकाल में राजदरबार की ओर से हलवाइयों को सामग्री देकर मालपुए बनवाए जाते थे, इसलिए यह नाम पड़ा। आदिवासी समाज में मालपुए को ‘काली रोटी’ कहा जाता है।
5. मेले में कितनी भीड़ उमड़ने का अनुमान है?
राजस्थान पर्यटन के अनुसार मेले में 4 से 5 लाख तक मेलार्थियों के पहुंचने का अनुमान है।
6. पहले दिन कौन जा सकता है?
पहला दिन सभी के लिए खुला रहता है – पुरुष और महिला दोनों मेले का आनंद ले सकते हैं; नो एंट्री सिर्फ दूसरे दिन लागू होती है।
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