Friday, October 23, 2026
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“वंदे मातरम् विवाद में आग: शर्मिला टैगोर के ‘सिर्फ दो अंतरे’ सुझाव पर भड़के मुकेश खन्ना, बोले- ‘आयशा बेगम बनकर बात कर रही हैं

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देशभक्ति के गीत और धार्मिक आस्था के बीच की महीन रेखा पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। वरिष्ठ अभिनेता मुकेश खन्ना और दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगोर के बीच ‘वंदे मातरम्’ को लेकर जुबानी जंग ने सोशल मीडिया से लेकर बॉलीवुड के गलियारों तक सुर्खियां बटोर ली हैं। एक तरफ शर्मिला ने धार्मिक संवेदनशीलता का हवाला देते हुए राष्ट्रगीत के सिर्फ शुरुआती अंतरे गाने का सुझाव दिया, तो दूसरी तरफ मुकेश खन्ना उन पर ‘हिंदू धर्म भूल जाने’ का आरोप लगा बैठे। इस बीच कंगना रनोट के बयान ने बहस को और गरमा दिया है।

विवाद की जड़: राष्ट्रगान की मांग से शुरू हुई बहस

मामले की शुरुआत खुद मुकेश खन्ना के एक बयान से हुई थी। उन्होंने हाल ही में मांग उठाई थी कि ‘जन गण मन’ को हटाकर ‘वंदे मातरम’ को भारत का राष्ट्रगान बनाया जाए। इस मांग पर जब देशभर में चर्चा गरम हुई, तो शर्मिला टैगोर ने न्यूज एजेंसी IANS से बातचीत में राष्ट्रगीत के गायन को लेकर अपनी राय रखी – और यहीं से विवाद ने तूल पकड़ लिया।

शर्मिला टैगोर ने कहा: ‘वंदे काली, वंदे दुर्गा’ कहना मुश्किल

शर्मिला टैगोर का तर्क था कि जो लोग सिर्फ एक ईश्वर में विश्वास रखते हैं, उनके लिए वंदे मातरम् के सभी अंतरे गाना आसान नहीं है। उन्होंने IANS से कहा, “बहुत से धार्मिक लोग एक ही ईश्वर में विश्वास करते हैं, कई ईश्वरों में नहीं। वंदे मातरम् में एक अंतरा है, जिसमें कई देवताओं का जिक्र है। जो लोग एक धर्म, एक ईश्वर में विश्वास करते हैं, उनके लिए ‘वंदे काली, वंदे दुर्गा’ कहना मुश्किल है। अगर हम भारत के सभी धार्मिक लोगों को साथ लेकर चलें, तो वंदे मातरम् के पहले दो अंतरे बहुत अच्छे हैं।”

यानी शर्मिला का सुझाव था कि आपसी सौहार्द्र और धार्मिक समावेशिता के लिए राष्ट्रगीत का ज्यादातर हिस्सा ही गाया जाए।

मुकेश खन्ना का पलटवार: ‘आयशा बेगम बनकर बात कर रही हैं’

शर्मिला के इस बयान पर मुकेश खन्ना का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने न सिर्फ इस सुझाव को खारिज किया, बल्कि शर्मिला की निजी पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए करारा हमला बोला। उन्होंने कहा, “आप बंगाल में पली-बढ़ी हैं, जहां काली पूजा इतने बड़े स्तर पर मनाई जाती है। आप बंगाली संस्कृति और बंगाली फिल्मों के बीच बड़ी हुई हैं। फिर आज आपको समझ में आ रहा है कि एक धर्म वाला इसको एक्सेप्ट नहीं करेगा… आज आप आयशा बेगम बनकर बात कर रही हैं। आज आपको मुस्लिम धर्म समझ में आ रहा है। हिंदू धर्म क्या भूल गई आप?”

मुकेश खन्ना के इस बयान में शर्मिला टैगोर की नवाब मंसूर अली खान पटौदी से हुई शादी और शादी के बाद उनके नाम बदलकर ‘आयशा बेगम’ रखे जाने का संकेत था। उनका सवाल साफ था – बंगाल की बेटी, जो काली पूजा की संस्कृति में पली-बढ़ी, वह आज अचानक किसी एक धर्म की आपत्ति को समझ क्यों रही है?

कंगना रनोत की एंट्री: ‘हिंदू-मुस्लिम सोच से बाहर आइए’

बहस जब अपने चरम पर थी, तभी अभिनेत्री कंगना रनोत ने भी इसमें कदम रखा। कंगना ने शर्मिला टैगोर के इंटरव्यू का वीडियो अपनी इंस्टाग्राम स्टोरीज पर शेयर किया और लिखा, “मैं खुश हूं कि शर्मिला जी ने वंदे मातरम् को लेकर अपनी आपत्ति के बारे में बात की। किसी भी कविता या गीत में शब्द रूपक होते हैं… कृपया हिंदू-मुस्लिम सोच से बाहर आइए।”

दिलचस्प है कि कंगना ने इस मामले में शर्मिला के पक्ष में तर्क दिया और लोगों से धार्मिक चश्मे से परे जाकर गीत के साहित्यिक और भावनात्मक अर्थ को देखने की अपील की। उनका कहना था कि कविता में शब्द रूपक हैं, जिन्हें सिर्फ शाब्दिक अर्थ में नहीं लिया जाना चाहिए।

पुरानी आपत्तियों का जिक्र और ‘मां तुझे सलाम’

मुकेश खन्ना ने इस दौरान वंदे मातरम् पर ऐतिहासिक रूप से उठाई गई आपत्तियों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि सालों पहले भी यह आपत्ति उठाई गई थी कि मुस्लिम केवल खुदा के सामने झुकते हैं, इसलिए किसी और के सामने नहीं झुकेंगे। खन्ना ने इस तर्क को सिरे से खारिज किया। साथ ही, मातृभूमि के प्रति सम्मान का उदाहरण देते हुए उन्होंने एआर रहमान के प्रसिद्ध गीत ‘मां तुझे सलाम’ का हवाला दिया, जो देश के प्रति प्रेम और श्रद्धा की भावना को बिना किसी धार्मिक बंधन के व्यक्त करता है।

बहस असल में किस बारे में है?

यह विवाद सिर्फ एक गीत के कुछ अंतरों तक सीमित नहीं है। दरअसल यह दो बड़े सवालों से जुड़ा है – पहला, राष्ट्रीय प्रतीकों की पवित्रता और उनकी सर्वस्वीकार्यता, और दूसरा, बहुधर्मी देश में धार्मिक संवेदनशीलता की सीमा। एक पक्ष का मानना है कि राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान जैसे प्रतीकों पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए, चाहे वह किसी भी समुदाय की आस्था से टकराए। दूसरे पक्ष का तर्क है कि जिस देश में इतने धर्म और इतनी मान्यताएं रहती हैं, वहां यह जरूरी है कि राष्ट्रीय प्रतीक हर नागरिक के लिए सम्मान का विषय बने रहें, न कि उलझन का।

वैसे, ऐतिहासिक नजरिए से देखें तो ‘वंदे मातरम्’ सिर्फ एक देशभक्ति गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा का स्रोत रहा है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की यह रचना क्रांतिकारियों के होठों पर रही और कांग्रेस के अधिवेशनों में इसे गाकर ही आजादी की अलख जगाई जाती थी। किसी भी राष्ट्र के लिए ऐसे प्रतीक भावनात्मक निवेश के केंद्र होते हैं, और यही वजह है कि इनसे जुड़ा हर विवाद इतनी जल्दी आग पकड़ता है।

फिलहाल क्या?

अभी तक शर्मिला टैगोर की ओर से मुकेश खन्ना के इस तीखे हमले का कोई सीधा जवाब नहीं आया है। सोशल मीडिया पर दोनों के समर्थकों के बीच जमकर बहस जारी है। विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद जितना राष्ट्रगीत के बारे में है, उससे कहीं ज्यादा देश में बढ़ती ध्रुवीकरण की राजनीति और धर्म-संस्कृति की बहस के बारे में है। असली सवाल यही है कि क्या देश अपनी विविधता में एकता का रास्ता निकालेगा, या संवेदनशीलताएं आपसी भरोसे को और कमजोर करेंगी – जवाब आने वाले दिनों में ही साफ होगा।

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Swati Singh
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Swati Singh is a writer at 'Harawal' and a lifestyle expert. Committed to accurate, simple, and trustworthy journalism. She strives to provide readers with a clear perspective.

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