Friday, November 6, 2026
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Great Indian Bustard: थार में तीन चूजों से जागी नई उम्मीद, इंसानों से दूर रेगिस्तान में सीख रहे जिंदा रहने का हुनर

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थार की सुनसान रेत पर तीन नन्हे कदम… और एक पूरी प्रजाति की सांसें अटकीं

राजस्थान के जैसलमेर जिले में, जहां थार का सुनहरा रेगिस्तान क्षितिज तक फैला हुआ है, वहीं एक ऐसी कहानी गढ़ी जा रही है जो शायद भारतीय वन्यजीव इतिहास का सबसे नाजुक और सबसे साहसी अध्याय बन जाए। रामदेवरा के एक विशेष बाड़े में पल रहे तीन नन्हे चूजे – R9, R10 और R11 – इन दिनों देश भर के पर्यावरणविदों, जीव वैज्ञानिकों और वन्यजीव प्रेमियों की निगाहों का केंद्र बने हुए हैं।

दिखने में ये मामूली, रोएंदार, बमुश्किल एक महीने के परिंदे हैं। लेकिन इनके छोटे-छोटे कदमों में एक पूरी प्रजाति – ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) – का भविष्य कैद है। ये दुनिया के सबसे संकटग्रस्त पक्षियों में शुमार हैं, और भारत की धरती से इनके पूरी तरह विलुप्त होने की घड़ी बस कुछ ही सांसों दूर खड़ी है।

कौन हैं R9, R10 और R11?

ये तीनों चूजे भारत के महत्वाकांक्षी रीवाइल्डिंग प्रोग्राम के पहले बैच का हिस्सा हैं। इनमें दो नर और एक मादा है। इन्हें जंगल से बचाए गए अंडों से कैद में तैयार किया गया है, और अब इनकी परवरिश उन परिस्थितियों में की जा रही है जो हूबहू थार के जंगली माहौल जैसी हैं।

एक महीने के इन ‘नन्हे योद्धाओं’ के कंधों पर वह बोझ है जो शायद ही किसी पक्षी के हिस्से में आया हो – अपनी पूरी प्रजाति को विलुप्ति के कगार से वापस खींच लाने का बोझ।

‘जंगली’ बनने की अनोखी ट्रेनिंग: 160 मीटर लंबा, 14 मीटर ऊंचा बाड़ा

इन चूजों के लिए तैयार किया गया बाड़ा किसी साधारण पिंजरे जैसा नहीं है। 160 मीटर लंबा, 64 मीटर चौड़ा और 14 मीटर ऊंचा – यह विशाल संरचना अपने आप में एक ‘लघु थार’ है।

बाड़े के अंदर वही देसी झाड़ियां हैं जो थार में उगती हैं, वही घास है जो मानसून के बाद रेगिस्तान की धरती पर हरियाली बिखेरती है, और वही खुली जगहें हैं जहां ग्रेट इंडियन बस्टर्ड अपनी शानदार, धीमी उड़ान भरते हैं।

मकसद स्पष्ट है – चूजों को रेगिस्तान की चिलचिलाती धूप, गर्म हवाओं और अनिश्चित मौसम का आदी बनाना, लेकिन उन्हें शिकारियों से पूरी तरह सुरक्षित रखना।

इंसानों से ‘शून्य संपर्क’: क्यों जरूरी है यह सख्ती?

इस पूरी प्रक्रिया का सबसे रोचक और वैज्ञानिक पहलू है इंसानों से चूजों की पूर्ण दूरी। भोजन तक इन्हें एक छोटी खिड़की के जरिए, पास के ब्रीडिंग सेंटर से पहुंचाया जाता है। कारण? – चूजे कभी भी भोजन को इंसान की मौजूदगी से जोड़कर न देखें।

क्योंकि यदि उन्होंने इंसान को ‘भोजनदाता’ समझ लिया, तो जंगल में छोड़े जाने के बाद वे किसी भी इंसान के पास चले जाएंगे – और यही उनकी मौत का सबसे बड़ा कारण बन सकता है।

बाड़े के हर कोने में CCTV कैमरों की चौकस निगाहें हैं। चूजों की हर हरकत, हर दाना चुगने का अंदाज, हर उड़ने की कोशिश – सब कुछ रिकॉर्ड हो रहा है।

डेजर्ट नेशनल पार्क के अधिकारी अशोक सिंह के अनुसार, “चूजों को धीरे-धीरे देसी पेड़-पौधों, कीड़ों और रेगिस्तानी मौसम के संपर्क में लाया जा रहा है, ताकि वे जंगल में जिंदा रहने के जरूरी हुनर सीख सकें।”

चार महीने का इम्तिहान, फिर ‘आजादी’

आगामी कम से कम 4 महीने इन चूजों के लिए किसी कठिन परीक्षा से कम नहीं। यदि इस दौरान ये अपनी सुरक्षा खुद करने में सक्षम हो गए, यदि उन्होंने रेगिस्तान की भाषा समझ ली, यदि उन्होंने खतरे को पहचानना सीख लिया – तभी इन्हें डेजर्ट नेशनल पार्क के विभिन्न हिस्सों में मुक्त आकाश के नीचे छोड़ा जाएगा।

आंकड़े जो झकझोर देते हैं: सिर्फ 100-125 गोडावण बचे हैं!

वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) के आंकड़े रोंगटे खड़े कर देते हैं –

पैरामीटरस्थिति
जैसलमेर में जंगली GIBमात्र 100-125
पिछले 10 वर्षों में आबादीस्थिर (लेकिन बढ़ी नहीं)
मूल आवास क्षेत्र में सिकुड़नअब सिर्फ 16% क्षेत्र में मौजूद

एक समय था जब गोडावण भारत के 11 राज्यों में विचरण करता था। आज यह मुख्यतः राजस्थान के थार तक सिमट कर रह गया है।

‘मौत की तारें’ और अन्य अनदेखे दुश्मन

गोडावण का वजन 18 किलोग्राम तक पहुंच सकता है, और इसकी उड़ान धीमी होती है। यही धीमापन इसके लिए अभिशाप बन गया है। थार के आसमान से गुजरती हाई-टेंशन बिजली की लाइनें इनकी सबसे बड़ी ‘साइलेंट किलर’ हैं।

इसके अलावा –

  • जंगली सूअर – अंडों को नष्ट करते हैं
  • आवारा कुत्ते – चूजों का शिकार करते हैं
  • नीलगाय – घोंसलों को रौंद देते हैं
  • बिजली की तारें – उड़ान के दौरान टकराव से मौत

विशेषज्ञ की चेतावनी: ‘सिर्फ चूजे पैदा करना काफी नहीं’

वाइल्डलाइफ बायोलॉजिस्ट डॉ. सुमित डूकिया का बयान इस पूरी कोशिश की सबसे बड़ी चुनौती को उजागर करता है – “सिर्फ चूजे पैदा कर लेना काफी नहीं है। असली चुनौती है इनके लिए एक सुरक्षित घर बचाकर रखना।”

उनका इशारा उस विरोधाभास की ओर है जहां एक तरफ हम कैद में चूजे तैयार कर रहे हैं, और दूसरी तरफ उनके प्राकृतिक आवास पर सोलर पैनल, विंड टर्बाइन, हाईटेंशन लाइनें और मानवीय हस्तक्षेप लगातार बढ़ रहा है।

अंतिम शब्द: तीन पंखों पर टिकी एक प्रजाति की सांसें

आज R9, R10 और R11 केवल तीन चूजे नहीं हैं। ये उम्मीद हैं। ये विज्ञान हैं। ये भारत की उस प्रतिबद्धता का प्रमाण हैं कि हम अपनी प्राकृतिक विरासत को यूं ही मरने नहीं देंगे।

क्या ये तीनों आने वाले महीनों में एक झुंड की नींव रखेंगे? क्या इनसे शुरू हुई कड़ी आगे बढ़कर सैकड़ों गोडावण थार के आसमान में शान से उड़ते नजर आएंगे? या ये भी भविष्य में सिर्फ आंकड़ों की एक और पंक्ति बनकर रह जाएंगे?

अगले कुछ महीने तय करेंगे कि थार की रेत पर लिखी जा रही यह कहानी ‘पुनर्जन्म’ की बनेगी या ‘विदाई’ की।

आप क्या कर सकते हैं?

  • गोडावण संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं का समर्थन करें
  • सोशल मीडिया पर इस प्रजाति की जागरूकता फैलाएं
  • भूमिगत बिजली लाइनों की मांग को समर्थन दें
  • डेजर्ट नेशनल पार्क क्षेत्र में जिम्मेदार पर्यटन अपनाएं

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