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Thursday, August 6, 2026
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राजस्थान में नजर आई दुर्लभ अल्बिनो गिलहरी: लाखों में एक होती है

टोंक/देवली: राजस्थान के टोंक जिले में वन्यजीव प्रेमियों और स्थानीय लोगों का ध्यान एक दुर्लभ सफेद गिलहरी ने खींचा है। देवली स्थित केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल यानी CISF के आरटीसी परिसर के वन क्षेत्र में यह गिलहरी नीम के पेड़ों के बीच दिखाई दी। परिसर में मौजूद जवानों ने इसे अपने मोबाइल कैमरे में रिकॉर्ड किया।

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, जिस क्षेत्र में यह गिलहरी दिखाई दी है, वह धीरे-धीरे वन्यजीवों के लिए सुरक्षित आवास के रूप में विकसित हो रहा है। विभाग का मानना है कि परिसर में मौजूद हरियाली और संरक्षण का वातावरण ऐसे दुर्लभ जीवों के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार कर रहा है।

दुर्लभ अल्बिनो गिलहरी

देवली के CISF आरटीसी परिसर में वन क्षेत्र के बीच सफेद रंग की गिलहरी दिखाई देने के बाद जवानों ने इसकी तस्वीरें और वीडियो अपने मोबाइल फोन में कैद किए। सामान्य तौर पर गिलहरियों का शरीर भूरे, धूसर या मिश्रित रंगों में दिखाई देता है। ऐसे में पूरी तरह सफेद रंग की गिलहरी का नजर आना अपने आप में असामान्य घटना माना गया।

यह क्षेत्र केवल एक संस्थान का परिसर नहीं, बल्कि पेड़-पौधों और छोटे वन्यजीवों के लिए विकसित होता हुआ हरित क्षेत्र भी है। वन विभाग के सहायक वन संरक्षक अनुराग महर्षि के अनुसार, परिसर में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसी संरक्षण-परिवेश में दुर्लभ गिलहरी का दिखाई देना सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

एक लाख में एक बताई गई अल्बिनो गिलहरी

वन विभाग के ACF अनुराग महर्षि ने बताया कि करीब एक लाख गिलहरी के बच्चों में से केवल एक अल्बिनो हो सकती है। उनके मुताबिक, अल्बिनो किसी अलग प्रजाति का नाम नहीं है, बल्कि आनुवंशिक बदलाव के कारण पैदा होने वाली स्थिति है।

इस स्थिति में शरीर में मेलेनिन, यानी रंगद्रव्य, की कमी या अनुपस्थिति होती है। इसी वजह से जीव का फर या त्वचा सामान्य रंग के बजाय सफेद या बहुत हल्के रंग की दिखाई दे सकती है। अल्बिनो जीवों की आंखें लाल या गुलाबी दिखाई देने की संभावना भी रहती है, क्योंकि आंखों में सामान्य पिगमेंट की मात्रा कम होती है।

हालांकि, किसी सफेद गिलहरी को देखकर केवल रंग के आधार पर उसे अल्बिनो कहना हमेशा पर्याप्त नहीं होता। वन्यजीव विज्ञान में सफेद रंगत के लिए अल्बिनिज्म के साथ-साथ लीसिज्म जैसी स्थिति भी जिम्मेदार हो सकती है।

अल्बिनिज्म और लीसिज्म में क्या अंतर है?

अल्बिनिज्म में मेलेनिन के निर्माण पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। ऐसे जीवों का शरीर सफेद या बहुत हल्का दिखाई दे सकता है और आंखें लाल, गुलाबी या हल्की दिखाई दे सकती हैं।

इसके विपरीत, लीसिज्म में शरीर के कुछ हिस्सों में पिगमेंट कम हो सकता है, जिससे फर सफेद या चितकबरा दिखाई देता है, लेकिन आंखों का रंग सामान्य या गहरा रह सकता है। इसलिए किसी सफेद गिलहरी की सही पहचान के लिए केवल फोटो नहीं, बल्कि आंखों के रंग, शरीर की रंगत और विशेषज्ञ परीक्षण भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

टोंक की घटना में वन विभाग के अधिकारी ने इसे अल्बिनो गिलहरी बताया है। इसलिए उपलब्ध रिपोर्ट के आधार पर इसे अल्बिनो गिलहरी के रूप में ही प्रस्तुत किया जा रहा है। हालांकि, वैज्ञानिक दृष्टि से अल्बिनिज्म और लीसिज्म का अंतिम अंतर विशेषज्ञ निरीक्षण से ही स्पष्ट होता है।

सफेद रंगत सुंदर दिखती है, लेकिन जंगल में चुनौती भी बन सकती है

सफेद फर किसी वन्यजीव को देखने में आकर्षक जरूर बनाता है, लेकिन प्राकृतिक वातावरण में यही रंगत उसके लिए जोखिम भी बढ़ा सकती है। सामान्य रंग वाले जीव पेड़ों, मिट्टी, छाल और पत्तियों के बीच आसानी से छिप सकते हैं। सफेद रंग उनके लिए प्राकृतिक छलावरण को कमजोर कर सकता है।

अल्बिनो जीवों को तेज रोशनी के प्रति संवेदनशीलता और दृष्टि संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, खुले वातावरण में उनका रंग शिकारी जीवों का ध्यान जल्दी आकर्षित कर सकता है।

इसका मतलब यह नहीं है कि हर अल्बिनो जीव लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकता। यदि उसे पर्याप्त भोजन, सुरक्षित आवास और शिकारियों से बचाव मिलता रहे, तो वह सामान्य जीवन जी सकता है। देवली का CISF परिसर इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि रिपोर्ट के अनुसार यहां वन क्षेत्र और संरक्षण का वातावरण मौजूद है।

टोंक में पहले भी दिखाई दे चुकी है सफेद गिलहरी

वन विभाग के अनुसार, टोंक जिले में सफेद गिलहरी का यह पहला उल्लेख नहीं है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले वर्ष जून में भी इसी CISF परिसर में सफेद गिलहरी दिखाई दी थी।

यदि एक ही परिसर में अलग-अलग समय पर ऐसी गिलहरी देखी गई है, तो यह क्षेत्र स्थानीय छोटे वन्यजीवों के लिए विशेष महत्व रख सकता है। हालांकि, केवल दो बार दिखाई देने के आधार पर किसी स्थायी आबादी या प्रजनन का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। इसके लिए नियमित निगरानी, फोटो पहचान, कैमरा ट्रैप और वन विभाग का व्यवस्थित सर्वे जरूरी होगा।

राजस्थान में अल्बिनो गिलहरी का दूसरा प्रमुख रिकॉर्ड

ACF अनुराग महर्षि के अनुसार, राजस्थान में यह अल्बिनो गिलहरी का संभवतः दूसरा प्रमुख रिकॉर्ड है। यहां “संभवतः” शब्द महत्वपूर्ण है, क्योंकि दुर्लभ वन्यजीवों से जुड़े रिकॉर्ड कई बार स्थानीय जानकारी, फोटो और विभागीय दस्तावेजों के आधार पर सामने आते हैं। ऐसे मामलों में राज्य स्तर पर वन विभाग के रिकॉर्ड और विशेषज्ञ सत्यापन से ही तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट होती है।

फिर भी, किसी क्षेत्र में दुर्लभ रंग-रूप वाला वन्यजीव दिखाई देना जैव विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण संकेत है। इससे यह भी पता चलता है कि छोटे शहरी या संस्थागत हरित क्षेत्र वन्यजीवों के लिए आश्रय बन सकते हैं।

पांच-धारी ताड़ गिलहरी के संदर्भ में समझिए

भारत के उत्तर और मध्य भागों में पाई जाने वाली पांच-धारी ताड़ गिलहरी, जिसका वैज्ञानिक नाम Funambulus pennantii है, गिलहरी की एक पहचानी जाने वाली प्रजाति है। इसके शरीर पर धारियां और घनी पूंछ प्रमुख पहचान मानी जाती हैं।

हालांकि, टोंक में देखी गई सफेद गिलहरी को इसी प्रजाति का अल्बिनो रूप बताने की पुष्टि उपलब्ध रिपोर्ट में नहीं की गई है। इसलिए इस घटना को किसी निश्चित प्रजाति से जोड़ने के बजाय “दुर्लभ सफेद या अल्बिनो गिलहरी” के रूप में समझना अधिक सावधानीपूर्ण होगा।

पांच-धारी ताड़ गिलहरी को भारत के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची IV में सूचीबद्ध बताया गया है।

CISF परिसर का संरक्षण मॉडल क्यों महत्वपूर्ण है?

देवली का CISF आरटीसी परिसर यह दिखाता है कि संस्थागत परिसर भी स्थानीय जैव विविधता के संरक्षण में भूमिका निभा सकते हैं। यदि परिसर में पेड़ों की कटाई सीमित हो, वनस्पति बनी रहे, पानी के स्रोत उपलब्ध हों और वन्यजीवों को परेशान न किया जाए, तो छोटे जीवों के लिए सुरक्षित आवास तैयार हो सकता है।

ऐसे क्षेत्रों में संरक्षण के लिए कुछ कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं-

  • पेड़ों और झाड़ियों को अनावश्यक रूप से न हटाना।
  • वन्यजीवों को भोजन देने के बजाय उनके प्राकृतिक भोजन स्रोत सुरक्षित रखना।
  • सफेद गिलहरी को पकड़ने या उसके पीछे भीड़ लगाने से बचना।
  • तस्वीर लेने के लिए फ्लैश का अनावश्यक इस्तेमाल न करना।
  • कुत्तों और अन्य पालतू जानवरों से वन्यजीवों की सुरक्षा करना।
  • नियमित कैमरा निगरानी और वन विभाग को सूचना देना।
  • परिसर में रासायनिक प्रदूषण और प्लास्टिक कचरे को कम करना।

सफेद गिलहरी दिखे तो लोग क्या करें?

यदि किसी व्यक्ति को ऐसी गिलहरी या कोई अन्य दुर्लभ वन्यजीव दिखाई दे, तो उसे पकड़ने, छूने या घर ले जाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। जानवर को दूर से देखकर उसकी फोटो या वीडियो रिकॉर्ड की जा सकती है, लेकिन उसके प्राकृतिक व्यवहार में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

यदि जीव घायल दिखे, असामान्य रूप से सुस्त हो या सड़क अथवा खुले खतरे में फंसा हो, तो तुरंत वन विभाग या स्थानीय प्रशासन को सूचना देना बेहतर होगा। वन्यजीवों की सुरक्षा में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जिम्मेदार दूरी और समय पर सूचना की होती है।

टोंक के लिए यह केवल कौतूहल नहीं, संरक्षण का संदेश है

CISF परिसर में दुर्लभ सफेद गिलहरी का दिखाई देना एक रोचक वन्यजीव घटना जरूर है, लेकिन इसका महत्व केवल तस्वीरों और कौतूहल तक सीमित नहीं है। यह घटना बताती है कि हरित परिसर, पेड़ और शांत वातावरण छोटे वन्यजीवों के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं।

टोंक में इस तरह की घटना स्थानीय जैव विविधता के दस्तावेजीकरण की शुरुआत भी बन सकती है। यदि वन विभाग, CISF परिसर और स्थानीय नागरिक मिलकर नियमित निगरानी करें, तो आने वाले समय में इस क्षेत्र में पाए जाने वाले अन्य छोटे वन्यजीवों की जानकारी भी सामने आ सकती है।

दुर्लभ सफेद गिलहरी ने देवली के एक हरित परिसर को चर्चा में ला दिया है। अब जरूरत इस बात की है कि इसे केवल असामान्य रंग वाली गिलहरी के रूप में न देखा जाए, बल्कि उसके पीछे छिपे संरक्षण-संदेश को भी समझा जाए—प्रकृति को जितना सुरक्षित स्थान मिलेगा, जैव विविधता उतनी ही अधिक दिखाई देगी।

FAQs: टोंक की दुर्लभ सफेद गिलहरी से जुड़े सवाल

टोंक में सफेद गिलहरी कहां दिखाई दी?

यह गिलहरी देवली स्थित CISF के आरटीसी परिसर के वन क्षेत्र में नीम के पेड़ों के बीच दिखाई दी।

सफेद गिलहरी को अल्बिनो क्यों कहा जाता है?

वन विभाग के ACF अनुराग महर्षि के अनुसार, यह आनुवंशिक बदलाव के कारण शरीर में मेलेनिन की कमी से जुड़ी स्थिति है। इसके कारण फर सफेद और आंखें लाल या गुलाबी दिखाई दे सकती हैं।

क्या सफेद गिलहरी एक अलग प्रजाति होती है?

नहीं। अल्बिनो गिलहरी कोई अलग प्रजाति नहीं होती। यह सामान्य गिलहरी में आनुवंशिक परिवर्तन से उत्पन्न रंग-सम्बंधी स्थिति हो सकती है।

अल्बिनिज्म और लीसिज्म में क्या अंतर है?

अल्बिनिज्म में मेलेनिन की कमी व्यापक रूप से प्रभावित होती है और आंखें भी हल्की, लाल या गुलाबी दिखाई दे सकती हैं। लीसिज्म में शरीर का फर सफेद हो सकता है, लेकिन आंखों का रंग सामान्य रह सकता है।

क्या टोंक में पहले भी सफेद गिलहरी देखी गई है?

हां। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वर्ष जून में भी इसी CISF परिसर में सफेद गिलहरी दिखाई दी थी।

स्रोत:

  • Ohio State University Bio Museum
  • Texas Parks and Wildlife Department
  • iNaturalist

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