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Thursday, August 6, 2026
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राजस्थान कांग्रेस में फिर सियासी घमासान, डोटासरा के बयान पर गहलोत खेमे का पलटवार

जयपुर: राजस्थान कांग्रेस में नेताओं के बीच चल रही अंदरूनी बयानबाजी एक बार फिर सार्वजनिक मंच पर दिखाई दी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के एक बयान के बाद पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष संदीप चौधरी की सोशल मीडिया पोस्ट ने राजनीतिक चर्चाओं को तेज कर दिया है।

संदीप चौधरी ने अपनी पोस्ट में किसी नेता का नाम नहीं लिया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे डोटासरा के बयान का जवाब माना जा रहा है। इस घटनाक्रम ने कांग्रेस के भीतर चल रही गुटीय खींचतान, नेतृत्व को लेकर असहजता और संगठनात्मक संवाद की शैली पर नई बहस छेड़ दी है।

डोटासरा ने क्या कहा था?

रिपोर्टों के अनुसार, गोविंद सिंह डोटासरा ने जयपुर में मीडिया से बातचीत के दौरान अपने काम और पार्टी नेतृत्व के समर्थन का उल्लेख किया था। डोटासरा ने कहा कि राहुल गांधी ने उनसे और नेता टीकाराम जूली से उनके काम को लेकर सकारात्मक बात कही है।

डोटासरा ने कहा, “राहुल जी ने मुझसे कहा था कि डोटासरा और जूली, तुम लोग बहुत अच्छा काम कर रहे हो।” इसके बाद उन्होंने कहा, “अब मुझे किसी ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे से सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं है।”

डोटासरा ने व्यक्तिगत ब्रांडिंग और व्यक्तिवाद को लेकर भी टिप्पणी की। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा, “व्यक्तिगत ब्रांडिंग जो करते हैं, वो उन्हें मुबारक हो। व्यक्तिवाद ने कांग्रेस का बहुत नुकसान किया है, तभी तो एक बार हमारी सरकार आती है और फिर चली जाती है।”

हालांकि डोटासरा ने अपने बयान में किसी नेता का नाम स्पष्ट रूप से नहीं लिया, लेकिन इसे कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और व्यक्तिगत प्रभाव को लेकर चल रही बहस से जोड़कर देखा गया।

संदीप चौधरी की पोस्ट से बढ़ी हलचल

डोटासरा के बयान के अगले दिन कांग्रेस प्रदेश उपाध्यक्ष संदीप चौधरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट की। उन्होंने भी किसी नेता का नाम नहीं लिया, लेकिन उनकी पोस्ट को डोटासरा की टिप्पणी के जवाब के रूप में देखा गया।

संदीप चौधरी ने लिखा, “ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे कुछ बन जाते हैं तो पागल हो जाते हैं।”

दोनों बयानों में प्रयुक्त शब्दों की समानता के कारण राजनीतिक चर्चाओं को बल मिला। हालांकि संदीप चौधरी ने अपनी पोस्ट में डोटासरा का नाम नहीं लिया, लेकिन मीडिया रिपोर्टों और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं में इसे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पर निशाना साधने वाली टिप्पणी के तौर पर प्रस्तुत किया गया है।

कौन हैं संदीप चौधरी?

संदीप चौधरी राजस्थान कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थक नेताओं में गिना जाता है। रिपोर्टों में उन्हें कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला के करीब भी बताया गया है।

संदीप चौधरी गहलोत सरकार के दौरान बंजर भूमि विकास बोर्ड के चेयरमैन रह चुके हैं। इस पद पर रहते हुए उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा भी मिला था।

यही राजनीतिक पृष्ठभूमि इस पूरे घटनाक्रम को अधिक महत्वपूर्ण बनाती है। डोटासरा राजस्थान कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष हैं, जबकि संदीप चौधरी को गहलोत खेमे के नजदीक माना जाता है। ऐसे में नाम लिए बिना की गई टिप्पणियां भी पार्टी के भीतर चल रहे शक्ति-संतुलन और आपसी असहमति की ओर संकेत करती हुई दिखाई देती हैं।

गहलोत ने मतभेद से किया इनकार

इस विवाद के बीच पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने डोटासरा के साथ किसी भी तरह की अनबन से इनकार किया। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, गहलोत ने कहा, “अध्यक्षजी क्या नाराजगी जताएंगे, हमारी कोई अनबन नहीं है।” उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस पूरी तरह एकजुट है।

गहलोत ने कार्यकर्ताओं के उनके बंगले पर आने को लेकर भी सफाई दी। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा कि पूर्व मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीय के साथ आए लोग कार्यकर्ता थे और केवल मिलने आए थे। गहलोत ने यह भी कहा कि कार्यकर्ताओं का आना-जाना सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

इस सफाई के बावजूद डोटासरा और संदीप चौधरी के बयानों ने पार्टी के भीतर चर्चा को शांत नहीं होने दिया। एक ओर गहलोत सार्वजनिक रूप से किसी विवाद से इनकार कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनके समर्थक माने जाने वाले नेता की पोस्ट को डोटासरा के बयान की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है।

व्यक्तिगत ब्रांडिंग बनाम संगठन की राजनीति

इस पूरे विवाद का एक प्रमुख पहलू व्यक्तिगत ब्रांडिंग और संगठनात्मक नेतृत्व से जुड़ा है। डोटासरा ने व्यक्तिवाद को कांग्रेस के लिए नुकसानदेह बताया। उनके बयान का मूल तर्क यह था कि पार्टी की राजनीति व्यक्तिगत प्रभाव के बजाय संगठन और सामूहिक नेतृत्व पर आधारित होनी चाहिए।

दूसरी ओर, संदीप चौधरी की पोस्ट ने इस बहस को व्यक्तिगत कटाक्ष का रूप दे दिया। यही वजह है कि विवाद केवल दो नेताओं के बीच बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कांग्रेस के भीतर नेतृत्व शैली और गुटीय संवाद का विषय बन गया।

राजनीतिक दलों में मतभेद होना सामान्य है, लेकिन जब नेताओं की टिप्पणियां सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया तक पहुंचती हैं, तो उसका असर कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर भी पड़ता है। इससे पार्टी की एकजुटता का संदेश कमजोर हो सकता है और विरोधी दलों को राजनीतिक हमला करने का अवसर मिल सकता है।

पंचायत और निकाय चुनावों से पहले बढ़ी चुनौती

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब राजस्थान कांग्रेस आगामी पंचायत और निकाय चुनावों की तैयारियों में जुटी हुई है। चुनावी राजनीति में संगठन की एकजुटता, स्थानीय नेतृत्व का समन्वय और कार्यकर्ताओं के बीच स्पष्ट संदेश महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

यदि वरिष्ठ नेताओं के बीच सार्वजनिक बयानबाजी लगातार जारी रहती है, तो इसका असर टिकट वितरण, स्थानीय गुटबाजी और चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है। दूसरी ओर, यदि पार्टी नेतृत्व समय रहते संवाद के जरिए विवाद को नियंत्रित करता है, तो यह प्रकरण संगठन के भीतर मतभेदों को सुलझाने का अवसर भी बन सकता है।

फिलहाल, डोटासरा के बयान और संदीप चौधरी की पोस्ट ने राजस्थान कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को फिर सुर्खियों में ला दिया है। गहलोत ने किसी अनबन से इनकार किया है, लेकिन सार्वजनिक तौर पर सामने आई टिप्पणियां यह बताती हैं कि पार्टी के भीतर नेतृत्व, प्रभाव और राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर बहस अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

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