37.1 C
New Delhi
Sunday, May 24, 2026
Homeदेशराजस्थानउदयपुर में 27 मई को मनाई जाएगी महाराज शक्तिसिंह जी की 484वीं...

उदयपुर में 27 मई को मनाई जाएगी महाराज शक्तिसिंह जी की 484वीं जयंती, मेवाड़ की वीर विरासत को किया जाएगा नमन

उदयपुर में 27 मई को महाराज शक्तिसिंह जी की 484वीं जयंती, मेवाड़ की वीर विरासत पर केंद्रित होगा भव्य समारोह

उदयपुर। मेवाड़ की धरती एक बार फिर अपने वीर इतिहास के गौरवगान की साक्षी बनने जा रही है। महाराणा प्रताप के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले और मेवाड़ की स्वाभिमानी परंपरा के प्रतीक महाराज शक्तिसिंह जी की 484वीं जयंती 27 मई 2026 को उदयपुर में श्रद्धा, सम्मान और भव्यता के साथ मनाई जाएगी।

इस अवसर पर आयोजित समारोह में मेवाड़ की वीरता, त्याग और सांस्कृतिक विरासत को केंद्र में रखकर इतिहास एवं समाज के विभिन्न आयामों पर विचार-विमर्श किया जाएगा, जिससे युवा पीढ़ी अपने गौरवशाली अतीत से प्रेरणा प्राप्त कर सके।

महाराज शक्तिसिंह जी जयंती समारोह

उदयपुर में 27 मई 2026 को महाराज शक्तिसिंह जी की 484वीं जयंती समारोहपूर्वक मनाई जाएगी। उपलब्ध आमंत्रण-पत्र के अनुसार यह आयोजन सुबह 10 बजे सुखाड़िया रंगमंच (टाउन हॉल), उदयपुर में प्रस्तावित है। आयोजन को मेवाड़ की ऐतिहासिक स्मृति से जुड़े व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें सर्वसमाज की भागीदारी का आह्वान भी किया गया है।

समारोह की विशेषता यह है कि यह केवल जयंती-उत्सव तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि मेवाड़ के उस ऐतिहासिक विमर्श को फिर से सामने लाता है जिसमें पराक्रम, निष्ठा, पारिवारिक संघर्ष, राज्य-धर्म और स्वाभिमान जैसे प्रश्न एक साथ जुड़े रहे हैं। यही कारण है कि इस आयोजन को स्थानीय धार्मिक-सांस्कृतिक सम्मान के साथ-साथ मेवाड़ की सामूहिक ऐतिहासिक चेतना के पुनर्स्मरण के रूप में भी देखा जा रहा है।

उदयपुर में प्रस्तावित यह जयंती समारोह इसी व्यापक विरासत-संवाद का हिस्सा है। आमंत्रण-पत्र में सर्वसमाज से सहभागिता की अपील की गई है, जो यह दर्शाती है कि आयोजन को किसी एक वंशीय या सीमित सामाजिक कार्यक्रम के बजाय व्यापक सांस्कृतिक एकजुटता के अवसर के रूप में रखा जा रहा है। मेवाड़ की स्मृतियों में जिन नामों ने स्वाभिमान, प्रतिरोध और वीरता की धारणा को मजबूत किया, महाराज शक्तिसिंह जी का नाम उनमें विशिष्ट स्थान रखता है।

27 मई का यह समारोह केवल एक जयंती नहीं, बल्कि मेवाड़ के उस ऐतिहासिक अध्याय को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम बनेगा, जिसमें रक्त-संबंध, युद्ध, राजधर्म, लोकगाथा और क्षत्रिय अस्मिता एक-दूसरे में गुंथी हुई हैं। उदयपुर जैसे शहर के लिए, जो स्वयं इतिहास और विरासत की जीवित राजधानी माना जाता है, यह आयोजन सांस्कृतिक निरंतरता का भी एक महत्वपूर्ण संकेत है।

महाराज शक्तिसिंह जी : अकबर के षड्यंत्रों को विफल कर मेवाड़ को सुरक्षित किया

ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, 1542 ई. को कुम्भलगढ़ में जन्मे महाराज शक्तिसिंह जी न केवल महाराणा प्रताप के छोटे भाई थे, बल्कि मेवाड़ की शक्तावत शाखा के संस्थापक और एक साहसिक कूटनीतिज्ञ भी थे। इतिहास में उन्हें अकबर के षड्यंत्रों को विफल करने वाले योद्धा के रूप में भी जाना जाता है। हल्दीघाटी युद्ध के निर्णायक क्षणों में जब महाराणा प्रताप संकट में थे, शक्ति सिंह जी ने उन्हें अपना घोड़ा देकर महाराणा प्रताप और मेवाड़ का मान रखा। इस वीरता के लिए मेवाड़ में यह दोहा आज भी प्रसिद्ध है:

“शक्ति थारी शक्ति नु हरि जाने ना नो,
सुर थारी हुंकार महाकाल सु निकट ना आये।”

महाराज शक्तिसिंह जी का नाम मेवाड़ के इतिहास में विशेष आदर के साथ लिया जाता है। उपलब्ध ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार वे महाराणा उदयसिंह जी के पुत्र और महाराणा प्रताप के छोटे भाई थे। इस पारिवारिक संबंध ने उन्हें स्वतः ही मेवाड़ के राजनीतिक और सैन्य इतिहास के एक महत्वपूर्ण पात्र के रूप में स्थापित किया, लेकिन उनकी स्मृति केवल राजवंशीय पहचान तक सीमित नहीं रही; लोक-परंपरा, वंशावली और जनश्रुति में भी उनका उल्लेख एक प्रभावशाली योद्धा-चरित्र के रूप में मिलता है।

राजस्थान और विशेषकर मेवाड़ की लोक-स्मृति में महाराज शक्तिसिंह जी को उस योद्धा के रूप में भी याद किया जाता है, जिसने संकट की घड़ी में महाराणा प्रताप के पक्ष में निर्णायक भूमिका निभाई। इतिहास स्रोत में यह वर्णन मिलता है कि हल्दीघाटी युद्ध के बाद पीछा कर रहे सैनिकों को मारकर उन्होंने महाराणा प्रताप का ही नहीं, मेवाड़ का मान बचाया और इसी प्रसंग से शक्तावत वंश की प्रतिष्ठा भी जुड़ती है। यही कथा जनमानस में उनकी छवि को वीरता, रक्त-संबंध और अंतिम क्षण की निष्ठा के प्रतीक के रूप में स्थापित करती है।

इतिहास लेखन के स्तर पर एक संतुलित दृष्टि यह कहती है कि महाराज शक्तिसिंह जी का व्यक्तित्व इतिहास और लोकगौरव-दोनों की सीमाओं पर खड़ा दिखाई देता है, और यही उन्हें और अधिक रोचक तथा महत्वपूर्ण बनाता है।

यही इतिहास और लोक-परंपरा का संगम महाराज शक्तिसिंह जी की विरासत को आज भी जीवंत और प्रासंगिक बनाए हुए है। एक ओर वे मेवाड़ के राजवंश के महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं, तो दूसरी ओर जनमानस की स्मृतियों में त्याग, वीरता, युद्धकौशल और भ्रातृ-निष्ठा के अद्वितीय प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

राजस्थान में विरासत-केंद्रित आयोजनों की बढ़ती लोकप्रियता इस बात का संकेत है कि समाज अब अपने इतिहास को केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि स्मृति समारोहों, जयंती आयोजनों और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से उसे जीवंत अनुभव के रूप में पुनर्स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। महाराज शक्तिसिंह जी की जयंती जैसे आयोजन इसी ऐतिहासिक चेतना, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक एकात्मता को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम बन रहे हैं।

483वीं जयंती चित्तौड़गढ़ की ऐतिहासिक धरती पर 27 मई 2025 को मनाई थी

साभार – क्षत्रिय संस्कृति

महाराज शक्तिसिंह जी की 483वीं जयंती के उपलक्ष में इन्दिरा प्रियदर्शिनी ऑडिटोरियम में गरिमामयी आयोजन समपन्न हुआ था, कार्यक्रम कि अध्यक्षता महाराज शक्ति सिंह जी के पाटवीं वंशज महाराज रणधीर सिंह जी भीण्डर ने की l कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जयपुर ग्रामीण के सांसद शाहपुरा राजपरिवार के श्रीमान राव राजेन्द्र सिंह जी थे।

भैसरोडगढ़ में हुआ स्वर्गवास

महाराज शक्ति सिंह का स्वर्गवास 1594 ई. में भैसरोडगढ़ में हुआ जहाँ आज भी उनकी स्मृति में एक स्मारक बना हुआ है। उनकी वीरगाथा को आने वाली पीढ़ियां हमेशा स्मरण करेंगी।

निष्कर्ष

महाराज शक्तिसिंह जी का जीवन इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि स्वाभिमान और कर्तव्य का टकराव कभी-कभी परिवार में दरारें पैदा कर देता है, लेकिन रक्त संबंधों से ऊपर उठकर भाईचारे का सच्चा प्रेम हर संकट में विजयी होता है।

चाहे वह अकबर के षड़यंत्र को नाकाम करना हो, हल्दीघाटी में भाई को जान बचाना हो, या फिर माताओं-बहनों की सुरक्षा के लिए पन्द्रह वर्षों तक संकट मोल लेना हो – शक्तिसिंह जी ने हर कदम पर साबित किया कि वे सच्चे योद्धा थे, जिनके लिए मेवाड़ और परिवार का मान सर्वोपरि था ।

“शक्ति थारी शक्ति नु हरि जाने ना नो” – यह दोहा आज भी मेवाड़ की वीर भूमि में गूंजता है, जो बताता है कि शक्तिसिंह जी की शक्ति का कोई सानी नहीं था

आज शक्तावत शाखा के रूप में उनकी विरासत जीवित है। उनके वंशज आज भी उसी शौर्य और स्वाभिमान के प्रतीक हैं, जिसकी नींव महाराज शक्तिसिंह जी ने रखी थी।

आपसे से निवेदन –

मेरा दायित्व निभाने का प्रयास तो मैंने कर दिया है। अब आपसे विनम्र निवेदन है कि इस संदेश को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने हेतु साझा करें। साथ ही, आपके विचार, सुझाव एवं प्रतिक्रिया सादर आमंत्रित हैं।

Bhanwar Singh Thada
Bhanwar Singh Thadahttps://theharawal.com
Founder of Harawal - The Frontline of News. Committed to truth, accuracy, and responsible journalism. Promoting fearless reporting and the timeless values of integrity and speed. Dedicated to informing the public and inspiring trust in the digital age.
सम्बन्धित पोस्ट्स

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular