क्या आप भी रोज ढाई घंटे सोशल मीडिया चलाते हैं? स्टडी में मानसिक स्वास्थ्य और डिप्रेशन को लेकर सामने आई बड़ी चेतावनी

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क्या आप भी रोज ढाई घंटे सोशल मीडिया चलाते हैं? स्टडी में मानसिक स्वास्थ्य और डिप्रेशन को लेकर सामने आई बड़ी चेतावनी
हरावल

रोजाना ढाई घंटे से ज्यादा सोशल मीडिया इस्तेमाल मानसिक स्वास्थ्य के लिए चिंता बढ़ा सकता है। जानिए स्टडी में डिप्रेशन, एंग्जायटी और तुलना को लेकर क्या सामने आया।

मोबाइल पर लगातार स्क्रॉलिंग बन सकती है मानसिक सेहत के लिए खतरे की घंटी

स्मार्टफोन आज जिंदगी की जरूरत बन चुका है। काम, पढ़ाई, मनोरंजन, बातचीत और खबरों से लेकर खरीदारी तक – हर गतिविधि का बड़ा हिस्सा मोबाइल स्क्रीन पर सिमट गया है। समस्या तब शुरू होती है, जब फोन का इस्तेमाल जरूरत से बढ़कर लगातार स्क्रॉलिंग और सोशल मीडिया देखने की आदत में बदल जाता है।

एक नई स्टडी में सोशल मीडिया पर बिताए जाने वाले समय और डिप्रेशन के स्व-रिपोर्टेड लक्षणों के बीच संबंध पर ध्यान दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, जब सोशल मीडिया इस्तेमाल का समय रोजाना करीब 150 मिनट यानी ढाई घंटे तक पहुंचता है, तो डिप्रेशन से जुड़ा संबंध सामान्य या तटस्थ स्थिति से सकारात्मक दिशा में बदलता दिखाई देता है।

हर अतिरिक्त घंटे के साथ बढ़ते दिखे डिप्रेशन के लक्षण

रिपोर्ट में यूनिवर्सिटी ऑफ सिनसिनाटी और नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी से जुड़ी रिसर्च का हवाला दिया गया है। इसमें शोधकर्ताओं ने अनुमान जताया कि सोशल मीडिया पर बिताए जाने वाले समय में हर अतिरिक्त एक घंटे के साथ डिप्रेशन के लक्षण बताए जाने की संभावना करीब 17 प्रतिशत बढ़ सकती है।

यहां यह समझना जरूरी है कि रिपोर्ट में बात सोशल मीडिया इस्तेमाल और डिप्रेशन के लक्षणों के बीच संबंध की हो रही है। इसे हर व्यक्ति पर लागू होने वाला निश्चित निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए। किसी व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य उसकी जीवनशैली, सामाजिक माहौल, काम का दबाव, नींद, शारीरिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत परिस्थितियों सहित कई कारकों से प्रभावित हो सकता है।

‘दूसरों की परफेक्ट लाइफ’ बढ़ा सकती है हीनभावना

सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली जिंदगी अक्सर चुनी हुई और संपादित होती है। लोग अपनी उपलब्धियां, यात्राएं, महंगे अनुभव, खुशहाल रिश्ते और बेहतर दिखने वाले पल साझा करते हैं। इसके विपरीत, संघर्ष, असफलता और तनाव आमतौर पर स्क्रीन से बाहर रह जाते हैं।

ऐसी स्थिति में लगातार दूसरों की ‘परफेक्ट लाइफ’ देखने वाला व्यक्ति अपने जीवन की तुलना उन चुनिंदा तस्वीरों और वीडियो से करने लगता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे तुलनात्मक हीनभावना और एंग्जायटी बढ़ने की आशंका हो सकती है।

धीरे-धीरे व्यक्ति को लग सकता है कि बाकी लोग उससे अधिक सफल, खुश या संतुष्ट हैं। यह धारणा वास्तविकता से अलग हो सकती है, लेकिन सोशल मीडिया फीड का लगातार संपर्क इस भ्रम को मजबूत कर सकता है।

तनाव कम करने के लिए फोन, लेकिन बढ़ सकता है तनाव

कई लोग तनाव, अकेलेपन या ऊब से बचने के लिए सोशल मीडिया खोलते हैं। कुछ मिनटों की स्क्रॉलिंग शुरुआत में ध्यान भटका सकती है, लेकिन जब यही आदत लंबे समय तक जारी रहती है, तो व्यक्ति मानसिक थकान, बेचैनी और नकारात्मक तुलना के चक्र में फंस सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, चिंता की बात यह है कि कुछ लोग डिप्रेशन या मानसिक तनाव के शुरुआती संकेत पहचान नहीं पाते। वे सोशल मीडिया को समस्या का समाधान समझकर उसका इस्तेमाल और बढ़ा देते हैं। इस तरह राहत पाने की कोशिश एक ऐसे चक्र में बदल सकती है, जो मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानी को और गहरा कर दे।

कौन से संकेत नजरअंदाज नहीं करने चाहिए?

यदि मोबाइल या सोशल मीडिया इस्तेमाल के बाद बार-बार निम्न अनुभव हो रहे हैं, तो अपनी डिजिटल आदतों पर ध्यान देना जरूरी है:

  • फोन दूर रखने पर बेचैनी या चिड़चिड़ापन
  • बिना किसी स्पष्ट उद्देश्य के लगातार फीड स्क्रॉल करना
  • दूसरों से अपनी तुलना करके निराश होना
  • सोशल मीडिया देखने के बाद मूड खराब होना
  • काम, पढ़ाई या बातचीत के दौरान बार-बार फोन चेक करना
  • वास्तविक जीवन की गतिविधियों में रुचि कम होना
  • तनाव या उदासी से बचने के लिए फोन पर निर्भर रहना
  • यह महसूस होना कि काफी समय बीत गया, लेकिन उपयोग पर नियंत्रण नहीं रहा

ये संकेत अपने आप में किसी मानसिक बीमारी का प्रमाण नहीं हैं। फिर भी, यदि इनका असर रोजमर्रा के जीवन पर पड़ रहा है, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए।

मोबाइल इस्तेमाल को संतुलित करने के व्यावहारिक तरीके

1. उपयोग का उद्देश्य तय करें

फोन खोलने से पहले तय करें कि आपको क्या करना है – मैसेज का जवाब देना, जानकारी देखना या किसी जरूरी काम को पूरा करना। बिना उद्देश्य के ऐप खोलने से स्क्रॉलिंग का समय बढ़ सकता है।

2. सोशल मीडिया के लिए समय सीमा लगाएं

फोन में मौजूद स्क्रीन-टाइम फीचर से यह देखें कि दिन में कितना समय सोशल मीडिया पर जा रहा है। पहले आंकड़ा जानना जरूरी है, तभी आदत में बदलाव संभव होगा।

3. नोटिफिकेशन कम करें

हर अलर्ट ध्यान भंग करता है और व्यक्ति को दोबारा ऐप खोलने के लिए प्रेरित कर सकता है। गैर-जरूरी नोटिफिकेशन बंद करने से फोन चेक करने की आवृत्ति कम की जा सकती है।

4. तुलना वाली सामग्री से दूरी बनाएं

ऐसे अकाउंट या पेज जिन्हें देखने के बाद लगातार हीनभावना या बेचैनी बढ़ती है, उन्हें म्यूट, अनफॉलो या सीमित किया जा सकता है।

5. तनाव के लिए केवल फोन पर निर्भर न रहें

टहलना, व्यायाम, संगीत, किताब, परिवार या मित्रों से बातचीत और पर्याप्त आराम तनाव कम करने के वैकल्पिक तरीके हो सकते हैं।

6. जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से बात करें

यदि उदासी, चिंता, निराशा या अकेलेपन की भावना लगातार बनी रहती है, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। समस्या को केवल मोबाइल की आदत मानकर टालना सही नहीं है।

निष्कर्ष

मोबाइल और सोशल मीडिया अपने आप में न तो पूरी तरह नुकसानदायक हैं और न ही हर उपयोगकर्ता पर उनका प्रभाव एक जैसा होता है। असली चुनौती तब पैदा होती है, जब सोशल मीडिया का इस्तेमाल तनाव से बचने का स्थायी साधन बन जाए और व्यक्ति अपनी मानसिक स्थिति को समझने के बजाय स्क्रीन में और अधिक उलझता चला जाए।

रिपोर्ट में सामने आया 150 मिनट का आंकड़ा एक चेतावनी संकेत की तरह देखा जा सकता है, न कि सभी लोगों के लिए लागू होने वाली कठोर सीमा के रूप में। सबसे जरूरी बात यह है कि उपयोग की अवधि के साथ-साथ उसके बाद होने वाले भावनात्मक प्रभाव पर भी ध्यान दिया जाए। यदि फोन इस्तेमाल करने के बाद मन हल्का होने के बजाय और अधिक बेचैन, उदास या असंतुष्ट महसूस हो, तो डिजिटल रूटीन में बदलाव का समय आ चुका है।

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