Wednesday, September 16, 2026
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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2026: 4 या 5 सितंबर? जानें शुभ मुहूर्त, विधि और व्रत के नियम

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जन्माष्टमी की तारीख को लेकर असमंजस – कुछ पंचांग 4 तो कुछ 5 सितंबर बता रहे हैं। जानें सही तिथि, निशीथ काल पूजा मुहूर्त, रोहिणी नक्षत्र, पूजा विधि, सामग्री और व्रत पारण के नियम

कंचन के दर्शन को तैयार हो जाइए, पर पहले तारीख का पेंच सुलझा लीजिए

भाद्रपद मास की कृष्ण अष्टमी आते ही देशभर के घरों में ढोल-मृदंग और ‘माखन चुरायो’ की धुन गूंजने लगती है। लेकिन इस बार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की तारीख को लेकर भक्तों के बीच खासा असमंजस है। कोई कह रहा है 4 सितंबर को जन्माष्टमी है, तो कोई 5 सितंबर की बात कर रहा है। सोशल मीडिया पर तो दोनों तिथियों के पोस्टर एक साथ वायरल हो रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर सही तारीख कौन सी है और व्रत-पूजा किस दिन करें? आइए, पंचांग की बारीकियों को समझते हुए इस पेंच को सुलझाते हैं।

क्यों है 4 और 5 सितंबर का विवाद?

दरअसल, हिंदू धर्म में जन्माष्टमी की तिथि का निर्धारण एक साथ तीन मानदंडों पर होता है – भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और मध्य रात्रि। जब अष्टमी तिथि पूरे दिन न पड़े और पर्व रोहिणी नक्षत्र व अर्धरात्रि पर टिका हो, तो पंचांगों में मतभेद पैदा हो जाता है। यही वजह है कि कुछ पंचांग 4 सितंबर तो कुछ 5 सितंबर की तारीख बता रहे हैं।

पंचांग विशेषज्ञों के अनुसार, चूंकि जन्माष्टमी भाद्रपद कृष्ण अष्टमी के साथ रोहिणी नक्षत्र और मध्य रात्रि पर निर्धारित होती है, इसलिए इस बार यह पवित्र पर्व शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को ही मनाया जाएगा। वहीं, कुछ क्षेत्रीय पंचांगों में अष्टमी तिथि के विस्तार को देखते हुए 5 सितंबर की भी चर्चा है, लेकिन प्रमुख पंचांगों के अनुसार मुख्य पर्व 4 सितंबर को ही है।

अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और निशीथ मुहूर्त – एक नजर में

विशेषसमय-विवरण
अष्टमी तिथि आरंभ4 सितंबर (शुक्रवार), रात 2:25 बजे
अष्टमी तिथि समाप्ति5 सितंबर (शनिवार), रात 12:13 बजे
निशीथ काल पूजा मुहूर्त4 सितंबर रात 12:14 बजे से 5 सितंबर रात 1:01 बजे तक
जन्मोत्सव क्षण (मध्य रात्रि)5 सितंबर की रात लगभग 12:37 बजे
दही हांडी5 सितंबर (शनिवार)

तालिका स्रोत: Panchang

जरूरी नोट: मुहूर्त का समय शहर और स्थानीय पंचांग के अनुसार 15-20 मिनट तक बदल सकता है। उदाहरण के लिए, दिल्ली के लिए द्रिक पंचांग निशीथ पूजा का समय रात 11:57 बजे से 12:43 बजे तक बताता है, वहीं प्रोकेराला के अनुसार यह रात 12:02 से 12:49 बजे तक है। अपने शहर के स्थानीय पंचांग से मिलान जरूर कर लें।

रोहिणी नक्षत्र का खास संयोग

जन्माष्टमी की पूजा में रोहिणी नक्षत्र का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार, जिस रात अर्धरात्रि में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का एक साथ योग बनता है, वह संयोग अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। इस बार भी रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर को ही रहेगा, जिससे जन्माष्टमी की पूजा का महत्व और बढ़ जाता है।

स्मार्त और वैष्णव परंपरा में क्या अंतर?

जन्माष्टमी में परंपरा का भेद भी तारीख तय करने में भूमिका निभाता है। स्मार्त परंपरा में जहां अष्टमी तिथि को आधार मानकर पूजा की जाती है, वहीं वैष्णव परंपरा में रोहिणी नक्षत्र और मध्यरात्रि को प्रधानता दी जाती है। कुछ स्मार्त पंचांगों में इस बार अष्टमी तिथि 3 सितंबर से 4 सितंबर दोपहर तक मानी गई है, जबकि वैष्णव परंपरा के अनुसार पर्व 4-5 सितंबर की मध्यरात्रि की पूजा पर केंद्रित है। अधिकांश घरों और मंदिरों में निशीथ काल की पूजा को ही मुख्य माना जाता है।

निशीथ काल में ऐसे करें लड्डू गोपाल की पूजा

जन्माष्टमी की रात निशीथ काल में श्रीकृष्ण का जन्म होने की मान्यता है, इसलिए मुख्य पूजा इसी समय की जाती है। स्टेप-बाय-स्टेप विधि इस प्रकार है:

पहला चरण – पंचामृत अभिषेक: निशीथ काल की पूजा में सबसे पहले लड्डू गोपाल का अभिषेक करें। इसके लिए स्वच्छ जल, दूध, दही, शहद और गंगाजल मिलाकर पंचामृत तैयार करें और कान्हा जी को स्नान कराएं।

दूसरा चरण – वस्त्र और श्रृंगार: अभिषेक के बाद गोपाल जी को नए वस्त्र पहनाएं और उनका सुंदर श्रृंगार करें। मुकुट, मोर पंख और बांसुरी की सजावट परंपरा का अहम हिस्सा है।

तीसरा चरण – तिलक और अर्घ्य: भगवान को चंदन का तिलक लगाएं और फूल अर्पित करें। भोग लगाने से पहले शुद्ध जल से संकल्प करें।

चौथा चरण – आरती और भोग: घर के मंदिर में धूप और दीप जलाकर श्रीकृष्ण की आरती करें। पूजा के दौरान भगवान को माखन-मिश्री सहित अपनी श्रद्धा के अनुसार भोग लगाएं। पूजा और भोग में तुलसी दल रखना इस परंपरा का अनिवार्य हिस्सा माना गया है।

भोग में क्या-क्या लगाएं?

लड्डू गोपाल को जन्माष्टमी के दिन अनेक प्रकार के प्रसाद का भोग लगाया जाता है। इनमें मुख्य रूप से माखन-मिश्री, पंचामृत, खीर, दही, खीरा, केला और पंजीरी शामिल हैं। मान्यता है कि कान्हा जी को माखन अत्यंत प्रिय है, इसलिए बिना माखन-मिश्री के जन्माष्टमी का भोग अधूरा माना जाता है। भोग लगाते समय तुलसी दल अवश्य रखें और भोग को शुद्ध मन से ही तैयार करें।

व्रत के नियम और पारण का समय

जन्माष्टमी का व्रत प्रातःकाल संकल्प के साथ शुरू होता है और निशीथ पूजा के बाद अगले दिन पारण के साथ समाप्त होता है। इस बार अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र दोनों 5 सितंबर को सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएंगे, जिसके चलते पंचांग विशेषज्ञ पारण 5 सितंबर की सुबह सूर्योदय के बाद करने की सलाह देते हैं। हालांकि, पारण का सटीक समय आपके स्थानीय पंचांग पर निर्भर करेगा, इसलिए पूजा के समय ही अपने पंडित या पंचांग से पारण का समय अवश्य जान लें।

भक्ति का पर्व, संयम की परीक्षा

जन्माष्टमी केवल उत्सव नहीं, बल्कि भक्ति, संयम और समर्पण का पर्व है। व्रत के दिन केवल फलाहार करने की परंपरा है और रात्रि में भजन-कीर्तन का विशेष महत्व है। माना जाता है कि जो भक्त इस दिन श्रद्धा और विधिवत पूजा करता है, उसके सभी कष्ट दूर होते हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है। इस बार 4 सितंबर की मध्यरात्रि में जब ठीक 12:37 बजे का शुभ क्षण आए, तो समूचे देश में एक साथ ‘जय श्रीकृष्ण’ के जयकारे गूंजेंगे – यही इस पर्व की सबसे बड़ी खूबसूरती है।

FAQs: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल: जन्माष्टमी 2026 की सही तारीख क्या है?
जवाब: प्रमुख पंचांगों के अनुसार जन्माष्टमी शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी। हालांकि, कुछ क्षेत्रीय पंचांग 5 सितंबर भी बता रहे हैं, इसलिए अपने स्थानीय पंचांग से मिलान करें।

सवाल: निशीथ काल पूजा का मुहूर्त क्या है?
जवाब: पंचांग के अनुसार पूजा का मुख्य मुहूर्त 4 सितंबर रात 12:14 बजे से 5 सितंबर रात 1:01 बजे तक है, जो शहर के अनुसार थोड़ा बदल सकता है।

सवाल: अष्टमी तिथि कब शुरू और कब खत्म होगी?
जवाब: भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि 4 सितंबर को रात 2:25 बजे शुरू होगी और 5 सितंबर को रात 12:13 बजे समाप्त होगी।

सवाल: जन्माष्टमी का व्रत कब खोलना (पारण) चाहिए?
जवाब: इस बार अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्योदय से पहले समाप्त हो रहे हैं, इसलिए पारण 5 सितंबर सुबह सूर्योदय के बाद करने की सलाह दी जाती है। सटीक समय के लिए स्थानीय पंचांग देखें।

सवाल: पूजा में कौन-कौन सी सामग्री चाहिए?
जवाब: पंचामृत (जल, दूध, दही, शहद, गंगाजल), नए वस्त्र, चंदन, फूल, तुलसी दल, धूप-दीप और भोग के लिए माखन-मिश्री, खीर, पंजीरी, दही, खीरा व केला।

Gargi Hada
Gargi Hadahttp://theharawal.com
Gargi Hada is a Spiritual Correspondent at TheHarawal.com. She covers Rajasthan’s spiritual traditions, ancient temples, religious heritage, sacred places, and the stories that shape its cultural identity. Through her writing, she explores the region’s faith, traditions, and timeless spiritual heritage for the modern reader.

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