राजस्थान के प्रमुख मंदिरों में बढ़ती आस्था के साथ चढ़ावे की राशि भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में अब मंदिर प्रबंधन केवल दान संग्रह तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि उसकी गणना, निगरानी और जवाबदेही को भी अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी बनाने की दिशा में कदम उठा रहा है। हाल के घटनाक्रमों के बाद राज्य के कुछ बड़े मंदिरों में चढ़ावे की गिनती को लेकर नए सुरक्षा और प्रशासनिक प्रयोग शुरू किए जा रहे हैं।
यह बदलाव केवल व्यवस्था सुधार का मामला नहीं है, बल्कि आस्था से जुड़े संस्थानों में भरोसे की नई रेखा खींचने जैसा है। जब दान की राशि करोड़ों में हो, श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही हो और मंदिरों की आर्थिक गतिविधियां व्यापक स्वरूप ले चुकी हों, तब पारदर्शिता केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य प्रशासनिक आवश्यकता बन जाती है।
आस्था बढ़ी, तो बढ़ी जवाबदेही की जरूरत
राजस्थान के दो बड़े कृष्ण धाम – सांवलियाजी और श्रीनाथजी – में बीते वर्षों में चढ़ावे में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, सांवलियाजी मंदिर में वित्त वर्ष 2025-26 में चढ़ावा 337.66 करोड़ रुपए तक पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष 2024-25 के 235.96 करोड़ रुपए की तुलना में बड़ा उछाल है। वहीं नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर में गोलक दानराशि 2022-23 के 20.71 करोड़ रुपए से बढ़कर 2025-26 में 25.69 करोड़ रुपए तक पहुंच गई।
इन आंकड़ों से साफ है कि मंदिरों में श्रद्धालुओं का विश्वास मजबूत हुआ है, लेकिन इसी के साथ दान प्रबंधन को लेकर अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितना चढ़ावा आया, बल्कि यह भी है कि उसकी गणना, रिकॉर्डिंग और सुरक्षा कितनी भरोसेमंद व्यवस्था में हो रही है।
सांवलियाजी में नई सोच: बिना जेब के कपड़े, CCTV और सुरक्षा निगरानी
चित्तौड़गढ़ स्थित सांवलियाजी मंदिर में चढ़ावे की गिनती को अधिक सुरक्षित बनाने के लिए कई स्तरों पर काम हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, यहां गणना कक्ष में पहले से वीडियो कैमरों की निगरानी मौजूद है, नोटों की गिनती के लिए विशेष टेबलें बनाई गई हैं और गिने गए नकद को उसी दिन बैंक स्टाफ को सौंपने की व्यवस्था है। साथ ही सोने-चांदी की भेंट पर रसीद देने जैसी प्रक्रिया भी पारदर्शिता को मजबूत करती है।
सबसे दिलचस्प और सख्त प्रस्ताव यह है कि गणना में लगे कर्मियों के लिए ऐसे वस्त्र अनिवार्य किए जाएं जिनमें जेबें न हों। इसके साथ डोर फ्रेम मेटल डिटेक्टर लगाने की तैयारी भी बताई गई है। यह संकेत है कि मंदिर प्रबंधन अब पारंपरिक भरोसे के साथ आधुनिक निगरानी तंत्र को जोड़ना चाहता है, ताकि प्रक्रिया पर किसी तरह का संदेह न रहे।
श्रीनाथजी मंदिर में कमेटी निगरानी और मल्टी-लेयर ऑडिट मॉडल
नाथद्वारा स्थित श्रीनाथजी मंदिर पहले से ही अपेक्षाकृत सुदृढ़ गणना तंत्र के लिए जाना जाता है। यहां चढ़ावे की गिनती चार CCTV कैमरों की निगरानी में होती है। एक टीम प्रारंभिक गिनती करती है, जबकि दूसरी टीम नोट काउंटिंग मशीन से दोबारा मिलान करती है। इसके बाद वाउचर जांच, आंतरिक ऑडिट और वैधानिक ऑडिट जैसी बहुस्तरीय प्रक्रिया पूरी की जाती है।
अब इस मॉडल को और अधिक सामाजिक विश्वसनीयता देने के लिए स्थानीय प्रतिष्ठित लोगों की एक कमेटी बनाने की तैयारी है, जो गणना व्यवस्था की निगरानी में भूमिका निभा सके। यह कदम महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे मंदिर प्रबंधन की आंतरिक प्रक्रिया में सामुदायिक भरोसा और सार्वजनिक भागीदारी का एक नया आयाम जुड़ सकता है।
पुष्कर में भी रिकॉर्ड, प्रक्रिया और निगरानी का संतुलन
पुष्कर स्थित ब्रह्माजी मंदिर में भी चढ़ावे की गणना एक तय प्रशासनिक ढांचे के तहत होती है। रिपोर्ट के मुताबिक, यहां दो महीने में 18 दान पेटियां खोली जाती हैं, जिनसे 15 से 17 लाख रुपए तक निकलते हैं। 2017 से अब तक मंदिर के खातों और एफडीआर में लगभग 14 करोड़ रुपए जमा होने की जानकारी दी गई है। गणना प्रक्रिया की वीडियोग्राफी और CCTV निगरानी सरकारी कर्मचारियों की मौजूदगी में की जाती है।
यह मॉडल बताता है कि पारदर्शिता सिर्फ बड़े दान वाले मंदिरों की जरूरत नहीं है, बल्कि हर उस धार्मिक संस्थान की आवश्यकता है जहां आस्था सार्वजनिक विश्वास से जुड़ी हो।
यह बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं, संस्थागत भी है
मंदिरों में चढ़ावे की पारदर्शिता का मुद्दा भावनात्मक होने के साथ-साथ संस्थागत महत्व भी रखता है। श्रद्धालु जब दान करते हैं, तो वे सिर्फ रकम नहीं देते – वे अपना विश्वास सौंपते हैं। ऐसे में हर रसीद, हर कैमरा, हर ऑडिट और हर निगरानी तंत्र उस विश्वास की रक्षा का माध्यम बन जाता है।
यही वजह है कि राजस्थान के मंदिरों में शुरू हो रहे ये प्रयोग केवल व्यवस्था सुधार नहीं, बल्कि धार्मिक संस्थानों के आधुनिक प्रशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत हैं। यह दिखाता है कि परंपरा और तकनीक साथ चल सकती हैं – और आस्था का सम्मान करते हुए जवाबदेही को भी मजबूत किया जा सकता है।
भविष्य के लिए क्या संदेश?
आने वाले समय में देशभर के मंदिरों के लिए राजस्थान का यह मॉडल एक संदर्भ बन सकता है। बिना जेब वाले गणना वस्त्र, CCTV निगरानी, डबल काउंटिंग, बैंक हैंडओवर, कमेटी पर्यवेक्षण और बहुस्तरीय ऑडिट जैसे कदम यह बताते हैं कि धार्मिक संस्थानों में वित्तीय पारदर्शिता को अब अधिक पेशेवर तरीके से देखा जा रहा है।
यदि ये प्रयोग प्रभावी साबित होते हैं, तो भविष्य में अन्य मंदिर ट्रस्ट भी इसी तरह के मॉडल अपनाने की दिशा में बढ़ सकते हैं। इससे न केवल प्रबंधन मजबूत होगा, बल्कि श्रद्धालुओं का विश्वास भी और गहरा होगा।
निष्कर्ष
राजस्थान के प्रमुख मंदिरों में चढ़ावे की गणना को लेकर जो नए प्रयोग शुरू हो रहे हैं, वे समय की मांग के अनुरूप दिखाई देते हैं। बढ़ती दानराशि के साथ पारदर्शिता, जवाबदेही और तकनीकी निगरानी का समावेश यह दर्शाता है कि धार्मिक संस्थान भी अब अधिक संगठित और उत्तरदायी ढांचे की ओर बढ़ रहे हैं।
आस्था का आधार विश्वास है, और विश्वास की सबसे बड़ी शर्त है – पारदर्शिता। मंदिर प्रबंधन अगर इस दिशा में ठोस कदम उठाता है, तो यह केवल व्यवस्था का सुधार नहीं, बल्कि श्रद्धा का सम्मान भी होगा।
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