लीड बॉक्स:
• भीलवाड़ा के सदर थाना प्रभारी (CI) लोकपाल सिंह राठौड़ (38) का बुधवार तड़के उदयपुर के गीतांजलि अस्पताल में निधन
• मंगलवार शाम सर्विस रिवॉल्वर से कनपटी पर चली गोली – सिर से आर-पार निकली
• भीलवाड़ा-उदयपुर NH पर 157 किमी का ग्रीन कॉरिडोर; ICU एंबुलेंस से महज 95 मिनट में अस्पताल पहुंचाया
• वेंटिलेटर सपोर्ट पर चल रहा था उपचार; बुधवार तड़के करीब 4 बजे अंतिम साँसें थमीं
• भीलवाड़ा व अजमेर पुलिस महकमे में शोक की लहर – आला अफसरों ने जताया दुख
जब ज़िंदगी और मौत के बीच चला ट्रैफिक खाली करने का अभियान
भीलवाड़ा से उदयपुर तक पूरा हाईवे जब ‘शांत’ हो गया, पुलिसकर्मी हर चौराहे पर खड़े थे और ICU एंबुलेंस बिना एक सेकंड रुके आगे बढ़ रही थी – यह दृश्य किसी फिल्म का नहीं, भीलवाड़ा पुलिस की अपने अधिकारी को बचाने की अंतिम कोशिश का था। वो कोशिश जो अपनी जगह इतिहास में दर्ज होगी – 157 किलोमीटर का सफर महज 95 मिनट में पूरा कर, सीआई लोकपाल सिंह को गीतांजलि अस्पताल पहुंचाया गया। लेकिन गोली सिर में आर-पार निकल चुकी थी – और बुधवार तड़के करीब 4 बजे उन्होंने आखिरी सांस ली।
मंगलवार शाम की घटना – एक-एक मिनट का हिसाब
मंगलवार (4 अगस्त 2026) शाम करीब 7 बजे थाना क्षेत्र में स्पेशल नाकाबंदी की ड्यूटी थी। सीआई लोकपाल सिंह ने अपने सब-इंस्पेक्टर को फोन कर दिया – “गाड़ी तैयार रखना, मैं आ रहा हूं”। कुछ ही पलों में सरकारी आवास के भीतर से गोली की आवाज़ गूंजी। सर्विस रिवॉल्वर से चली गोली सीधे कनपटी में लगी और सिर से आर-पार निकल गई। फर्श पर लहूलुहान गिरते देख घर में मौजूद पत्नी ने तुरंत पुलिस को सूचना दी। परिजनों और पुलिसकर्मियों ने मिलकर उन्हें सबसे पहले भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल (MGH) में भर्ती कराया। प्राथमिक उपचार के बाद सिर की गंभीर चोट को देखते हुए उन्हें रामस्नेही अस्पताल रेफर किया गया, लेकिन वहां के डॉक्टरों ने भी तुरंत उच्च केंद्र की सलाह दी।
‘95 मिनट में 157 किमी’ – ग्रीन कॉरिडोर के पीछे की कहानी
रात करीब 1 बजे भीलवाड़ा पुलिस अधीक्षक सागर राणा ने वो आदेश दिया, जो राजस्थान पुलिस की इतिहास में एक बेमिसाल मिसाल बन गया – भीलवाड़ा से उदयपुर तक ग्रीन कॉरिडोर बनाया जाए। व्यावहारिक रूप से इसका मतलब था:
- रास्ते में पड़ने वाले हर थाना क्षेत्र की पुलिस ने एंबुलेंस की एस्कॉर्ट की
- हर चौराहे, हर टोल प्लाज़ा और हर सिग्नल पर ट्रैफिक खाली कराया गया
- ICU सुविधा संपन्न एंबुलेंस लगातार मोबाइल मेडिकल सपोर्ट पर चलती रही
- पूरा 157 किलोमीटर का हाईवे सफर सिर्फ 95 मिनट में तय हुआ
यह एक ऐसी रात थी, जब राजस्थान पुलिस ने दिखाया कि एक जवान की जान बचाने के लिए वे पूरी मशीनरी कैसे एक साथ झोंक सकते हैं।
गीतांजलि अस्पताल में अंतिम लड़ाई
उदयपुर के गीतांजलि अस्पताल पहुंचते ही सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की टीम ने सीआई को तुरंत वेंटिलेटर सपोर्ट पर लिया। गोली सिर में आर-पार निकल चुकी थी, न्यूरोसर्जन की टीम ने बेहतर से बेहतर उपचार की कोशिश की, लेकिन मस्तिष्क को पहुंचा अपूरणीय नुकसान किसी भी उपचार के दायरे से बाहर था। बुधवार (5 अगस्त 2026) तड़के करीब 4 बजे मॉनिटर पर बीप की आवाज़ धीमी पड़ गई और सीआई लोकपाल सिंह ने आखिरी सांस ली। अस्पताल परिसर और बाद में पुलिस लाइन में शोक की गहरी लहर दौड़ गई।
कौन थे लोकपाल सिंह राठौड़?
- उम्र: 38 वर्ष
- मूल गांव: अजमेर ज़िले के विजयनगर क्षेत्र का नादसी गांव
- परिवार: माता-पिता और तीन भाई
- शादी: पहली पत्नी से तलाक हो चुका था; लगभग 2 महीने पहले दूसरी शादी की थी
- सेवा-काल: हाल ही में हुए तबादलों के बाद भीलवाड़ा सदर थाने का प्रभार मिला था
- पिछली पोस्टिंग: चित्तौड़गढ़ (2 वर्ष पूर्व आए), जहाजपुर, बिजौलिया
- छवि: अनुशासित, कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी; सहकर्मियों में स्नेह और परिवार में सम्मान
सूत्रों के अनुसार, पुलिस अधिकारी मानसिक तनाव, कार्यस्थल का दबाव और पारिवारिक पहलू – तीनों एंगल से जांच कर रही है। हालांकि, जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पुलिस ने इनकार किया है।
पुलिस महकमे में शोक की लहर
भीलवाड़ा और अजमेर दोनों ज़िलों की पुलिस लाइनों में अधिकारियों और जवानों की आंखें नम हैं। सोशल मीडिया पर पुलिसकर्मियों ने सीआई की तस्वीरें शेयर कर भावभीनी श्रद्धांजलि दी। आला अधिकारियों – SP सागर राणा, ASP राजेश आर्य, CO सदर नेमीचंद चौधरी, CO सिटी सज्जन सिंह सहित कई वरिष्ठ अफसरों ने गहरा दुख जताया।-नोट: इस खंड में दिए गए बयान और प्रतिक्रियाएं अफसरों की सार्वजनिक श्रद्धांजलि के सार से संकलित हैं; आधिकारिक बयान जारी होने पर अपडेट किए जाएंगे।
जांच की दिशा – क्या-क्या पड़ताल में है?
पुलिस ने शुरुआती जांच में कई प्रमुख बिंदुओं को चिह्नित किया है:
| जांच का एंगल | प्राथमिक फोकस |
|---|---|
| फोरेंसिक साइंस लैब (FSL) | सर्विस रिवॉल्वर, गोलियों के छर्रे, खून के नमूने |
| मोबाइल फॉरेंसिक (MOB) | सीआई और पत्नी के फोन के डेटा, कॉल रिकॉर्ड |
| दुर्घटनावश फायर | वर्दी बदलते समय रिवॉल्वर हाथ में था – सुरक्षा प्रोटोकॉल की अनदेखी? |
| मानसिक स्वास्थ्य | हालिया तबादला, ड्यूटी का दबाव, पारिवारिक जीवन |
| अन्य कोई एंगल | भावनात्मक स्थिति, सुरक्षा रिवॉल्वर की ट्रेनिंग की कमी |
पुलिस ने स्पष्ट किया है कि जांच पूरी होने से पहले किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाज़ी होगी। अफसरों ने लोगों से अपील की है कि अफ़वाहों और अपुष्ट ख़बरों से बचें।
हाल के ऐसे ही मामले – क्या बदल रहा है सोच?
पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य और कार्यस्थल तनाव का मुद्दा लंबे समय से विशेषज्ञों के एजेंडे में है। ऐसी घटनाएं एक बार फिर इस बहस को ताज़ा कर देती हैं कि ‘वर्दी पहनने वालों’ के लिए काउंसलिंग, स्ट्रेस मैनेजमेंट और फैमिली सपोर्ट सिस्टम कितना ज़रूरी है। पुलिस विभागों में अब वेलनेस यूनिट और काउंसलिंग सेल सक्रिय किए जा रहे हैं – यह दिशा भविष्य में ऐसी दुखद घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने में मददगार हो सकती है।
FAQs:अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q1. भीलवाड़ा SHO लोकपाल सिंह का निधन कब और कहां हुआ?
बुधवार (5 अगस्त 2026) तड़के करीब 4 बजे उदयपुर के गीतांजलि अस्पताल में उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।
Q2. ग्रीन कॉरिडोर कितना लंबा था और कितने समय में पूरा हुआ?
भीलवाड़ा से उदयपुर तक 157 किलोमीटर का ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया। ICU एंबुलेंस से महज 95 मिनट में सीआई को गीतांजलि अस्पताल पहुंचाया गया।
Q3. गोली कैसे चली और कहां लगी?
मंगलवार शाम वर्दी पहनते समय अचानक सर्विस रिवॉल्वर से फायर हो गया। गोली कनपटी पर लगी और सिर से आर-पार निकल गई।
Q4. इससे पहले उन्हें किन अस्पतालों में भर्ती कराया गया?
पहले महात्मा गांधी अस्पताल, फिर रामस्नेही अस्पताल भीलवाड़ा से होते हुए अंत में गीतांजलि अस्पताल उदयपुर में ICU/वेंटिलेटर सपोर्ट पर भर्ती किया गया।
Q5. ग्रीन कॉरिडोर का आदेश किसने दिया?
भीलवाड़ा पुलिस अधीक्षक (SP) सागर राणा के निर्देश पर मंगलवार देर रात करीब 1 बजे ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया।
Q6. क्या पुलिस ने घटना को दुर्घटना माना है?
अब तक पुलिस ने इसे दुर्घटनावश गोली चलने, मानसिक तनाव और अन्य संभावित पहलुओं सहित हर एंगल से जांच की है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले रिपोर्ट का इंतज़ार है।
श्रद्धांजलि – एक अधिकारी की अंतिम विदाई
“देश की सुरक्षा में जी-जान लगाने वाले अधिकारियों के मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक सहयोग की दिशा में ठोस कदम उठाने का वक़्त आ गया है। हर अधिकारी एक पहले इंसान है, फिर वर्दी।”
यह घटना हमें एक बार फिर याद दिलाती है कि वर्दी पहनकर सेवा देने वाले अधिकारी भी इंसान ही हैं – और उन्हें भी सबसे पहले इंसान की तरह सहयोग, सम्मान और सुरक्षा की ज़रूरत है।
संवेदना डिस्क्लेमर: यह लेख एक संवेदनशील मुद्दे पर है – शोक और भावनाओं का सम्मान ज़रूरी है। किसी भी अफ़वाह, अटकल या सनसनीखेज़ एंगल से बचा गया है। पुलिस की आधिकारिक जांच रिपोर्ट आने पर तथ्यों को अपडेट किया जाएगा।
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