Monday, September 14, 2026
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जयपुर निकाय चुनाव: बूथ के बाहर लगी ‘नोटा की टेबल’, UGC से नाराज मतदाताओं का लोकतांत्रिक विरोध

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चुनावी मैदान में प्रचार के रंग अक्सर देखने को मिलते हैं – कहीं झंडे लहराते हैं, कहीं पर्चियां बंटती हैं। लेकिन 11 सितंबर को राजस्थान निकाय चुनाव 2026 के दूसरे चरण के मतदान में राजधानी जयपुर ने वह नजारा पेश किया, जिसने राजनीतिक पंडितों तक को सोचने पर मजबूर कर दिया।

जयपुर नगर निगम के वार्ड नंबर 66 (जगतपुरा) के महात्मा गांधी स्कूल बूथ के ठीक बाहर भाजपा और कांग्रेस के परंपरागत बूथ काउंटरों के समानांतर एक तीसरी टेबल सजी – जिस पर न किसी पार्टी का झंडा था, न किसी प्रत्याशी की फोटो। इस टेबल का नाम था – ‘नोटा की टेबल’

हाइलाइट्स: एक नजर में पूरा मामला

बिंदुविवरण
चुनावराजस्थान निकाय चुनाव 2026 (दूसरा चरण)
मतदान की तिथि11 सितंबर 2026
घटना स्थलजयपुर नगर निगम, वार्ड 66, महात्मा गांधी स्कूल बूथ (जगतपुरा)
कुल वोटिंग63.55%
प्रत्याशियों की संख्या723
मतगणना14 सितंबर 2026, सुबह 8 बजे से
मेयर चुनाव21 सितंबर 2026

क्या है ‘नोटा की टेबल’ का पूरा मामला?

हरावल

मतदान के दिन जहां हर पार्टी अपने-अपने बूथ काउंटर से मतदाताओं को साधने में जुटी रहती है, वहीं वार्ड 66 में कुछ स्थानीय नागरिकों और कार्यकर्ताओं ने उलटी गेंद डाली। इन्होंने बूथ के बाहर अलग से टेबल लगाई और आने वाले हर मतदाता से सिर्फ एक ही अपील की –

“किसी पार्टी को वोट न दें, ईवीएम में NOTA का बटन दबाएं।”

यानी पर्चियां बांटने के बजाय इन लोगों ने लोकतंत्र में उपलब्ध ‘None of the Above’ (नोटा) विकल्प को ही अपने विरोध का हथियार बना लिया। न कोई नारेबाजी, न कोई बवाल – शांतिपूर्ण, लेकिन ऐसा विरोध, जिसका संदेश दोनों बड़ी पार्टियों तक साफ पहुंचा।

नाराजगी की वजह क्या है? दो मोर्चों पर आक्रोश

इस अनोखे विरोध के पीछे मतदाताओं की दो प्रमुख शिकायतें हैं:

1. प्रत्याशी चयन को लेकर असंतोष

वार्ड 66 में भाजपा द्वारा तय किए गए उम्मीदवार को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय जनता में भारी नाराजगी थी। लोगों का आरोप है कि टिकट वितरण में उनकी भावनाओं और स्थानीय विकास की उम्मीदों को ताक पर रख दिया गया।

2. ‘यूजीसी हटाओ’ अभियान का समर्थन

इस विरोध से जुड़े स्थानीय युवाओं और प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि केंद्र व राज्य सरकार द्वारा शिक्षा और विश्वविद्यालयी व्यवस्था से जुड़े नियमों में किए गए हालिया बदलावों से आम छात्र और शिक्षक वर्ग परेशान है। इन्हीं बदलावों के विरोध में चुनाव को आवाज उठाने का मंच बनाया गया।

सबसे दिलचस्प पहलू: न BJP, न कांग्रेस – तो किसे वोट?

यहीं इस पूरी घटना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू छिपा है। विरोध करने वाले मतदाताओं का स्टैंड साफ था:

  • भाजपा की कार्यशैली, नीतियों और प्रत्याशी चयन से पूर्ण असंतोष।
  • लेकिन कांग्रेस या किसी अन्य निर्दलीय/बागी उम्मीदवार को भी समर्थन देने को तैयार नहीं – क्योंकि वे किसी ‘अवसरवादी’ प्रत्याशी को मजबूत नहीं करना चाहते।

यानी इन मतदाताओं ने दोनों प्रमुख दलों को एक साथ संदेश दिया कि जनता के पास अब ‘कम बुरे’ को चुनने की मजबूरी नहीं, बल्कि विरोध दर्ज कराने का संवैधानिक विकल्प भी है।

आगे क्या? अब 14 सितंबर पर टिकीं नजरें

दूसरे चरण का मतदान संपन्न हो चुका है और 723 प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम मशीनों में कैद है। 14 सितंबर को सुबह 8 बजे वोटों की गिनती शुरू होगी। इसके बाद 21 सितंबर को नए मेयर पद के लिए चुनाव होगा।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है – क्या वार्ड 66 का ‘नोटा अभियान’ वोटों के आंकड़ों में दिखेगा? अगर नोटा के वोट उल्लेखनीय संख्या में आते हैं, तो यह सिर्फ एक वार्ड का नतीजा नहीं, बल्कि पार्टियों के लिए टिकट वितरण और जनता से कनेक्ट को लेकर बड़ा सबक बन सकता है।

विश्लेषण: NOTA – खामोश लेकिन दमदार संदेश

भारतीय लोकतंत्र में नोटा को अक्सर ‘बेकार वोट’ कहकर खारिज कर दिया जाता है, क्योंकि इससे नतीजे सीधे नहीं बदलते। लेकिन वार्ड 66 की घटना इसकी असली ताकत दिखाती है – यह असंतोष का आंकड़ा बन जाता है।

जब मतदाता घर बैठने के बजाय कतार में खड़ा होकर नोटा दबाता है, तो वह यह साबित करता है कि वह लोकतंत्र में विश्वास रखता है, लेकिन मौजूदा विकल्पों में नहीं। पार्टियों के लिए यह ‘पराजय’ से कम नहीं – क्योंकि यहां कोई विपक्षी नहीं जीतता, बल्कि व्यवस्था पर सवाल खड़ा होता है।

FAQs: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q1. जयपुर में ‘नोटा की टेबल’ कहां लगाई गई?

जयपुर नगर निगम के वार्ड नंबर 66 (जगतपुरा) स्थित महात्मा गांधी स्कूल मतदान बूथ के बाहर 11 सितंबर को स्थानीय नागरिकों ने भाजपा-कांग्रेस के बूथ काउंटरों के समानांतर ‘नोटा की टेबल’ लगाई थी।

Q2. मतदाताओं ने NOTA के लिए प्रचार क्यों किया?

मतदाता भाजपा की कार्यशैली और स्थानीय प्रत्याशी के चयन से नाराज थे। साथ ही वे ‘यूजीसी हटाओ’ अभियान का समर्थन कर रहे थे। वे कांग्रेस या किसी अन्य पार्टी को भी समर्थन नहीं देना चाहते थे, इसलिए उन्होंने नोटा के जरिए विरोध दर्ज कराने का फैसला किया।

Q3. ‘यूजीसी हटाओ’ अभियान क्या है?

यह अभियान केंद्र व राज्य सरकार द्वारा शिक्षा और विश्वविद्यालयी व्यवस्था से जुड़े नियमों में किए गए हालिया बदलावों के विरोध में स्थानीय युवाओं और प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा चलाया गया है। इन बदलावों से छात्र और शिक्षक वर्ग परेशान बताए जा रहे हैं।

Q4. राजस्थान निकाय चुनाव 2026 के दूसरे चरण में कितनी वोटिंग हुई?

दूसरे चरण में 11 सितंबर 2026 को कुल 63.55 प्रतिशत मतदान हुआ, जिसमें 723 प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम में बंद हुई।

Q5. निकाय चुनाव की मतगणना और मेयर चुनाव कब होंगे?

वोटों की गिनती 14 सितंबर 2026 को सुबह 8 बजे से शुरू होगी, जबकि नए मेयर पद के लिए चुनाव 21 सितंबर 2026 को संपन्न कराया जाएगा।

Q6. क्या NOTA के ज्यादा वोट से चुनाव रद्द हो सकता है?

नहीं। मौजूदा नियमों के अनुसार नोटा को अधिकतम वोट मिलने पर भी सबसे ज्यादा वोट पाने वाला प्रत्याशी ही विजेता घोषित होता है। हालांकि, नोटा के वोट राजनीतिक दलों के लिए जनता के असंतोष का संकेत जरूर बन जाते हैं।

निष्कर्ष

जयपुर के वार्ड 66 की ‘नोटा की टेबल’ छोटी घटना लग सकती है, लेकिन इसका संदेश बड़ा है – मतदाता अब टिकट वितरण, नीतियों और स्थानीय मुद्दों पर अपनी आवाज दर्ज कराने के लिए लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण रास्ते अपना रहा है। 14 सितंबर को आएंगे नतीजे यह बताएंगे कि यह विरोध कितना प्रभावी रहा, लेकिन इतना तय है कि इस अभियान ने राजनीतिक दलों को एक साफ चेतावनी दे दी है – जनता देख रही है, और अब वह विरोध भी व्यवस्थित करती है।

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